“माँ”
Updated: Jul 30, 2025
By Deep Popat
एक छोटा सा लफ्ज़ है "मां " पर उसमें पुरी दुनिया समाती है,
जन्नत की आस नहीं मुझे,जब तु अपनी गौद में सुलाती है।
तुझसे ही तो है आंगन सुहाना, तु ही है रब का नजराना
संगीत की फरमाइश नहीं मुझे,सरगम छेड़ के जब तु लौरी सुनाती हैं।
तुझसे शुरू मेरे ख़्वाबों का बसेरा, तुझ बिन हूं में बेसहारा,
सांसों की गुंजाईश नहीं मुझे,धड़कन बनके तु मुझमें समाती हैं।
खुद ईश्वर ने भी ये बात छेड़ी ,मुझसे भी है माँ की ममता बड़ी,
तूटते तारे से ख्वाहिश नहीं मुझे,हर दुआओं में तु मेरी आरज़ू सजाती है।
पहेचान है तेरी मुस्कुराहट, ख़ामोशी में भी सुनता हूं तेरी आहट,
नसीब से कोई सिफारिश नहीं मुझे,तेरे हाथो से मेरी तु किस्मत बनाती हैं।
बदले ना कभी भी ये आलम, तुजसे मिलना हो मेरा हर जनम,
मंजिल की अब तलाश नहीं मुझे,राही बनके जो तु मुझे हर राह दिखाती है।
एक छोटा सा लफ्ज़ है "मां " पर उसमें पुरी दुनिया समाती है,
जन्नत की आस नहीं मुझे,जब तु अपनी गौद में सुलाती है।
By Deep Popat

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