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घास

Nov 7, 2022
1 min read

By Prasanna Jha





जीवन की द्योतक, धरा की चूनर, नरम मखमली आस हूं मैं

गौर से देखो मुझे, घास हूं मैं।


नन्हे नन्हे पगों की कालीन बनती और कभी युवा मन की उड़ान

कभी देव चरण पर अर्पितदूब, कभी नव चेतन की मुस्कान

रहूं भले उपेक्षित, पर सोचो कितनी ख़ास हूं मैं

गौर से देखो ना, घास हूं मैं।


हूं बीज रहित पर निर्बीज ना होती मैं, ना किसी के चाहने से उगती और

ना अनवरत चरने से मरती मैं, उत्कट जिजीविषा की धारिका

स्व-अस्तित्व की प्यास हूं मैं, गौर से देखो न, घास हूं मैं।


जब रौंधते प्रतिदिन सैकड़ों पग निरंतर, तो समेट स्वयं को अपने अंतर

त्यागती उस ज़मीन को यूं कि हो वो मेरे बिन बंजर

हां, घास हूं मैं और प्यार है मुझे मेरे अस्तित्व से,

प्यारा है अपना स्वाभिमान, नही बनना मुझे जरूरतों की पगडंडी

जहां ना हो मेरा सम्मान, मुझे उगना है, चतरना है,

धान हल्दी संग आंचल में बांधना है, उपेक्षित नही, अपेक्षित रहूं जहां

उस आकाश की "काश" हूं मैं, गौर से देखो ना, घास हूं मैं।


By Prasanna Jha






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