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Sangharsh

By Shabeena Yaseen Khan


ये राख़ है

ये ख़ाक है

जला दूँ मैं

तो आग है


अकेली मेरी राह

पर जीतने की चाह


रातों को भी जागे

मेरी मुश्किलों से आगे

मेरी आँखों के ये सपने

मेरी मंज़िलों को भागे


मेरे लाहू का हर कतरा

मेरी आँख से बहा है

मेरे पैरों में ये छाले

मेरी मेहनत का आईना है





टूट के भिखरा

कई बार हौंसला है

मेरी माँ की थी दुआएं

जो हर बार ये जुड़ा है


तू रोक बार-बार

मैं वक्त सा बढूँगा

तू काट बार-बार

मैं जड़ सा उगूँगा


मेरे सपनो की आग

पानी से न बुझेगी

तूफ़ान में भी मैं

मशाल सा जलूँगा



तू तोड़ तो सही

मैं पहाड़ सा खड़ा हूँ

मेरे सपनो की ओर

मैं बाण सा चला हूँ


ये राख़ है

ये ख़ाक है

जला दूँ मैं

तो आग है


By Shabeena Yaseen Khan





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