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Rishto ki dor

By Ram Kripal Singh


रिश्तों की डोर


सन्नाटा क्यों छाया हुआ है, इतना शहर में शोर है?

चल रहा हूँ मैं अकेला, भीड़ चारो ओर है।।

मैं भी तो उनकी हीं तरह, पर पहचानता कोई नहीं।

था कभी पहले ना ऐसा, मुझे जानता कोई नहीं।।

बन गया मैं अजनबी या, ये शहर कोई और है?

टूट रही रिश्तों की डोर, ये आया कैसा दौर है ??

सुन सुन के माँ की लोरियाँ, मेरे कान थे थकते नहीं।

अब मैं सुनाता हूँ उन्हें, जो सुन वे सकते नहीं।।

मुँह को आता था कलेजा, देख कर आंसू ज़रा।

आज उस ममता की आँखे, आंसुओ से है भरा।।




ऊँगली पकड़ कर मैं चला, जिनके सहारे मैं कभी।

उनपे ही ऊँगली उठाई, तार तार है रिश्ते सभी।।

था छिड़कता जान भाई, भाई की हर शान पर।

तन गई हैं अब तलवारे, एक दूजे की जान पर।।

बंधनो के गाँठ अब, खुलते कलम की ज़ोर से।

सात जन्मों के वे कस्मे, आज़ाद है इस डोर से।।

गैरों ने टुकड़े जोड़ कर, कर दिए थे घर खड़े।

खींच दी दीवार हमने, घर अब टुकड़ों में पड़े।।

हम से मैं, मैं कब बना, ना याद ना अहसास है।

हो गए सब दूर अपने, कोई ना मेरे पास है।।

ज़हर मेरे है ज़िगर में, बातों में मेरे हैं ज़हर।

आदमी से नाग कब, कैसे बना में किस कदर??

ऐ ज़मीं क्या है पता, क्या आसमां तुझको खबर?

माँ ने तो अमृत पिलाया, बन गया कैसे ज़हर??

दोष किसका मैं बताऊं, खुद मैं ही ज़िम्मेदार हूँ।

कर दिया हूँ क़त्ल उसका, जिसका मैं ही पहरेदार हूँ।।

ऐ खुदाया खैर कर, भाईचारा और हो अमन।

ना टूटे रिश्तों की डोर, इंसानियत का हो चमन।।





By Ram Kripal Singh




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