Maun Ki Maut(मौन की मौत- हिंदी कविता)
- Hashtag Kalakar
- Nov 28
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By Rajneesh Khohiya
हद इतनी पार हो चुकी कि,
बेज़ुबान चिल्ला उठे हैं।
सूख चुके हैं आँसू,
अरमान जल उठे हैं।
जिन्हें ज़ुबान मिली थी,
वो मौन हैं अभी तक,
साँसें तो झूठी हैं सबकी,
सब कब के मर चुके हैं।
जो अब भी आँखें न खोलीं,
नहीं तुमने चुप्पी तोड़ी।
जो न आया मन को रोना,
तो मुबारक हो,
हम सब तो मर चुके हैं।
चीखें भी कैद हैं अब,
दीवारों के सीने में,
राख ढूँढती है लौ
अपने ही मकीन में।
सपनों की कब्रों पर
खामोशियाँ पल रही हैं,
ज़िंदा जिस्मों में बस
मौतें ही चल रही हैं।
By Rajneesh Khohiya

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