हद
- Hashtag Kalakar
- Aug 16, 2025
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By Anant Srivastav
ये उंगलियां जानती हैं
अपनी हद,
जो बढ़ती हैं धीरे-धीरे,
कभी स्मृतियों की परछाई में
कभी स्क्रीन पर एक नाम की तलाश में।
हर अक्षर को छूकर,
वो महसूस करती हैं बीते लम्हों की गरमाहट,
जो कभी दिल की धड़कनों से जुड़ी थी
अब बस वो कैद है चंद ठंडे डिजिटल अक्षरों में।
जब वो नाम बहुत नीचे चला जाए,
कॉल हिस्ट्री की अंतहीन फेहरिस्त में,
तो उंगलियां रुक जाती हैं
जैसे किसी याद की सीढ़ी पर ठिठक गई हों।
उनमें कंपन तो होता है,
पर हिम्मत नहीं बचती,
एक बार फिर कॉल करने की,
क्योंकि जवाब की संभावना
अब सन्नाटे में गुम हो चुकी होती है।
ये उंगलियां जानती हैं,
कि अब संवाद नहीं,
सिर्फ मौन है,
एक भारी चुप्पी,
जो टूटती नहीं।
कुछ देर तक स्क्रीन को निहारती हैं,
जैसे कोई पुराना पत्र पढ़ रही हों,
फिर धीरे से मोबाइल को बंद कर
आँखों की नमी को छिपा लेती हैं।
ना शिकायत करती हैं,
ना ही ज़ाहिर करती हैं मिलने की इच्छा,
बस एक आह लेकर
वो खुद को बाँध लेती हैं आत्म-संयम में।
ये उंगलियां केवल स्पर्श नहीं,
बल्कि एहसास की अभिव्यक्ति हैं,
जो जानती हैं कब थम जाना है,
कब चुप रहना है,
और कैसे बिना बोले
अलविदा कह देना है।
By Anant Srivastav

बहुत ही सुंदर एवं सराहनीय
बहुत ही सुंदर एवं सराहनीय
बहुत ही सुन्दर एवं सराहनीय
Beautifully written
सुंदर।