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भय

By Sushant Saurabh


भयभीत

मृत्यु से

या न जी पाने का दुख

मर जाना और जी न पाना

सहोदर लगते हो

पर अलग है

विपरीत ।

खोने का दुख,

भय की जननी है

और भय,

दुख की ।


शाम

कोयले की चादर

चारों ओर

निशा के आगमन का भय

कुछ छीन जाने का दुख

या फिर सबकुछ

अंधकार। घनघोर अंधकार।।





हाथों से एक दूसरे को टटोलते

हाथों की उंगलियां

टॉर्च की तरह

ढूंढती, इधर उधर


पर सुनसान

शांत, अकेला

इस डर से

रात्रि घोंघ जैसे

धीरे धीरे फिसलती

डर चाल से नहीं

सन्नाटे में, कोई साथ न होना

भीषण पीड़ा

धीरे से, चुपके से

दरवाजा खटकती

एक किरण, दूत बनके

उम्मीद की किरण

चकाचौंध

सफेद रात


खोने का भय अब भी

पर जूझने की हिम्मत

हिम्मत अकेले न होने का

हिम्मत एक जैसे भय के होने से

हिम्मत



By Sushant Saurabh




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