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याद

By Sandeep Sharma





मेरी आँख में आँसू बे-सबब नहीं थे किसी ने यादों की धूल उड़ाई थी

वो एक ख़्वाब जो अभी तक अधूरा था मैंने उसकी ता'बीर सुनाई थी

कल फिर उसने आने का वादा किया कल हमने फिर रात जगाई थी

पूछा जिसने भी जुदाई का सबब सबको वही दास्ताँ झूठी सुनाई थी

हँसते चेहरे को देख कर वो मुतमइन था ये अदाकारी तो मैंने कई बार दिखाई थी

अब नहीं उस को इस पुराने शहर से वास्ता जिसके लिए हम ने अपनी नई दुनिया भुलाई थी

वो अजनबी नहीं मेरी फ़ितरत से मैं जानता हूँ मगर मैंने देखी उसकी हर रग में बे-वफ़ाई थी

वो हम को एक पल भी मयस्सर न हुआ जिसकी कसमें हम ने बारहा खाई थी

उसके त'आक़ुब में हम चले आए दरिया छोड़ कर यहाँ हम ने सराब से प्यास बुझाई थी

मुझ को एक झूठ की रोशनी ने अंधा कर दिया जहाँ मेरे सच ने सब को राह दिखाई थी


By Sandeep Sharma




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