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माँ

By Suman Prajapat


आधी रात को कई बार बेचैन होकर उठ जाती है वो,,

हम ठीक है या नहीं, ये सोचकर सो नहीं पाती है वो I


कोई रूठ ना जाये, कई दफा

अपने वजूद को भी नजरअंदाज कर जाती है वो I


रिश्तो के मोतियों को एक धागे में पिरोके ,,

मकान को घर बनाती है वो I





चाहे उसके अंतर्मन में कितनी भी व्यथा क्यों ना हो,,

हमारी एक मुस्कराहट देख अपना दर्द भूल जाती है वो I


हमारे आने के इंतज़ार में, दरवाज़े पर टकटकी लगाए रहती है वो ,,

एक पैर रसोई में तो एक नजर घडी पर टिकाये रहती है वो I


माँ ही तो है, इस तरह हमारा स्वागत करती है जो I



By Suman Prajapat




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