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माँ

By Ashish Nagori


लग के सीने से, थोड़ी देर मुझे रोने दे माँ थक सा गया हूँ, थोड़ी देर मुझे सोने दे माँ थपथपा दे मुझे, थोड़ा सा करार आ जाये तेरी ममता की छाँव में मुझे खोने दे माँ चोट लगती मुझे, आँखों में नमी आती तेरे सो ना पाता कभी, पलकों से नींद जाती तेरे गुनगुना फिर वहीं सपनों से भरी लोरी की धुन आज फिर से वही सपने मुझे पिरोने दे माँ

लड़खड़ाए कदम जब भी मेरे, थामा तूने हर गुज़ारिश मेरी, हर ज़िद को, माना तूने गोद वाले तेरे झूले में मुझे फिर से झूला जिनमे गुज़रा मेरा बचपन, वही खिलौने दे माँ रोज़ बहाना नया बुनना, निवालो पे मेरे फेरना हाथों को हल्के से, गालों पे मेरे याद आती है बहुत माथे पे थपकी तेरी मुस्कुराहट तेरे चेहरे से, चुराने दे माँ मैं ज़माने के सभी तौर तरीकों में फ़सा ना तेरे पास बैठा कभी, ना रोया ना हँसा जो मेरी याद में सुखी हुई पलकें है तेरी उनको पुरानी यादों से भिगोने दे माँ लग के सीने से, थोड़ी देर मुझे रोने दे माँ थक सा गया हूँ, थोड़ी देर मुझे सोने दे माँ


By Ashish Nagori




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6 Comments

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jai singh
jai singh
Jun 05, 2023
Rated 5 out of 5 stars.

दिल की गहराईयो मे से ही एसे नायब शब्द रुपी मोती निकलते हैं। बहुत खूब....

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Unknown member
May 21, 2023

Very emotional and realistic.

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Unknown member
May 20, 2023

Beautiful lines ..


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Devendra Dhoot
Devendra Dhoot
May 19, 2023
Rated 5 out of 5 stars.

Beautifully articulated…Great going Ashish bhai!!

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Deepak Nangliya
Deepak Nangliya
May 19, 2023
Rated 5 out of 5 stars.

बहुत उम्दा कविता है । आशीष जी को बहुत बहुत बधाई ।

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