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धूप

By Varsha Rani


ज़िन्दगी की धूप तूने बड़ा तपाया,

रुपहले आईने तूने ढलती उम्र का अक्स दिखाया,

राह के काँटों तुमने पैरों को बड़ा उलझाया,

एक अंधे मोड़ पर खड़े हुए, अचानक यह क्यों याद आया ? 

कि अब तो करलूं हिसाब, कि क्या खोया और क्या पाया ?

तुम्हें सुख देने को हर तरीका अपनाया, 

अपने ही देह और मन की कारा में खुद को बंदी बनाया, 

फिर भी जीवन में क्यों हमेशा खुद को अकेला ही पाया ? 

क्या-क्या नहीं छोड़ा पाने को तुम्हारा हाथ ?

बाबा का प्यार, माँ का दुलार, भाई का साथ,  

बहनें, सखियां, मायके के आँगन की ठंडी छाँव, सावन की फुहार और झूला, 

कोयल की तान, चांदनी रात, बेला-गुलाब की महक, आज भी तो कुछ नहीं भूला I

खट्टी अमियां, मीठी गोली, अपनी गुड़िया की विदाई,   

नेग राखी का, दीवाली के दिए, दशहरे की मिठाई I  

यूं हंसती खेलती बिटिया अपनी ममतामयी देहरी लाँघ आई, 

लेकिन तुम्हारी दुल्हन बनकर केवल त्याग और दमन की शिक्षा ही पाई I

अपनी अस्मिता, अहं, स्नेह, सम्मान और आराम, 

सब कुछ त्यागना किसे कहते हैं, इसकी परिभाषा फिर समझ में आई I 

धीरे बोलना, चुप रहना, मायके का नाम न लेना, 

यूं बन गयी बहू और सिर्फ परंपरा ही निभाई I

मेरे मायके का किस्सा जब भी छेड़ा जाता था, 

दहेज़ कम लायी यही सुनने में बस आता था I

जब बेटों को दिया जन्म, तो तुमने जश्न मनाया, 

तुम्हारा ही तो अंश तुम्हारी बेटियां भी थीं, 

जिनको तुमने मसला, कुचला और गंवाया I

यूं एक मुट्ठी धूप और एक कतरा,

खुले आसमान को तुमने बड़ा तरसाया, 

थकन दी, नींद उड़ाया, मन को कलपाया I   

ढल रही उम्र पर आज भी कुछ नहीं भूला, 

तुम्हारे घर नहीं, मकान में क्या-क्या सितम नहीं झेला I

मैं आधा आसमान थी और तुम थे आधा, 

लेकिन तुम्हारे बीज के लिए मैं ही थी धरती पूरी I

क्या हुए सातों वचन, सात फेरों में जो तुमने था बाँधा,

जिस्म से जिस्म ही मिला, रूहों में क्यों रही दूरी ?

साथ मेरा जो छोड़ जाओगे, कोई उलझन मिटा न पाओगे,  

न पनपेगी कोई कोंपल, न खिलेंगे खेत-खलिहान, 

न बसेंगे घर आँगन, न बनेगें ऊँचे मकान I 

तुम सिर्फ आधा नस्ल हो इंसान का और मैं हूँ आधा, 

तुम्हें भी पैदा किया मैंने ही, पाला और साधा, 

तुमसे बराबरी की क्यों करूं अभिलाषा ? 

कभी समझ न पाया जो मेरे मन की कोमल भाषा I 

यह जान लो मैं तुम्हारे बराबर नहीं, तुमसे बेहतर हूँ ,

जो ठान लूं उसे कर गुज़रने का हौसला भी रखती हूँ I 

लेकिन मेरी संपूर्ण शक्ति को जो तुमने ठुकराया, 

वह भूल मेरी थी,

परंपरा निभाते हुए, मैंने भी उसे बिसराया I

देर से जागी हूँ, अब और सह न पाऊंगी,

अब सीता, सावित्री, पार्वती और लक्ष्मी बनकर और रह न पाऊंगी,

न दूँगी अग्निपरीक्षा, न ही धरती में अब समाऊंगी, 

मिला जो स्नेह अगर बस उसको ही निभाऊंगी, 

या फिर सरस्वती, दुर्गा और काली बनकर,  

सहस्त्र हाथों से हर दमन को मिटाऊंगी I 

कलम, किताब, कूँची, सुई और छुरी, 

बदल रही हैं, मेरे पुरातन जीवन की धुरी, 

करूंगी अपनी अब हर इच्छा पूरी,

किसी भी मंजिल से ना रखूंगी दूरी, 

तुम से अलग एक पहचान मैं रचाउंगी,

वो सारे पत्थर जो तुमने मारे हैं,

उन्ही की सीढ़ियाँ अब अपने लिए बनाऊंगी I 

तुम मेरे साथ चलो या न चलो, 

मेरे हमराह रहो या न रहो,

मैं अकेली आप ही अब आगे बढ़ती जाऊंगी I 

मिलेंगी संगीनियाँ जो अपनी जैसी अगर, 

तो आसान हो जाएगा यह मुश्किलों का सफ़र I  

अँधेरा चीरकर देखो जो दूर किरण झिलमिलाती है,  

वही तो मंजिल है, जो पास अपने मुझे बुलाती है I 


By Varsha Rani


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