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दौर

By Amit Kanthi





एक को चीज़ तो एक को नाचीज़ बनाकर बैठें हैं,

किसी को जंजीर तो किसी को शमशीर थमाकर बैठें हैं,

ये कैसे हमने किरदारों को दो किनारों में बाँटे रखे हैं,

ये किस दौर में हम साँसें चुराये बैठें हैं |


रावण से सीता के हरण और् द्रौपदि के वस्त्रहरण में,

हम मां दुर्गा और अर्धनर में ईश्वर को भुला बैठें हैं,

ये किस दौर में हम सांसें चुराये बैठें हैं |


श्रुंगार को हवस् और देह बाज़ार् बनाये बैठें हैं,

अर्थमात्र को देव और स्रुष्टि को निक्रुष्ट मान बैठें हैं,

ये किस दौर में हम सांसें चुराये बैठें हैं |


By Amit Kanthi





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