गीत
- Hashtag Kalakar
- Nov 28
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By Dhruwa Shankar Prasad
माथे पर दमकती बिंदिया है
उड़ा देती सबकी निंदिया है
आंखों में जादुई चमक है
बरसों तपने की दमक है
गालों को छूते दो झुमके हैं
कुंवारे दिल इनमें झूलते हैं
लबों पर मासूम मुस्कुराहट है
कुदरत की बड़ी इनायत है
सीने में एक दिल प्यारा है
प्यार बेशुमार समाया है
छोटी छोटी खुशियों में बड़ा सुकून ढूंढ लेता है
अपनों की खुशियों में दिल खुश हो लेता है
उजाला आत्मविश्वास का दिखता है
इसमें एक राज छुपा सा रहता है
संघर्ष की स्याह रातों में
सौ जुगनू जो पकड़े थे
आज वही उजाला करते हैं
योग से गहरा लगाव है
स्वास्थ्य से गहरा जुड़ाव है
सादगी का गहरा प्रभाव है
स्पर्श पाकर हाथ का लंच लजीज बन जाता है
सीजनल फ्रूट से ब्रेकफास्ट अजीज बन जाता है
सिर्फ लंच में जायका नहीं
बातों में भी जायका है
एक जुदा सलीका है
जो एक बार जुड़ जाता है
फिर दूर नहीं जा पाता है
मंच पर आते ही जादू आवाज का छा जाता है
दिल धड़कना भूल जाता है
वक्त भागना भूल जाता है
मां बच्ची बन गई है
बच्ची मां बन गई है
पिता लैंप पोस्ट हैं
भाई बहन दोस्त हैं
बेटी, बहन और अध्यापिका
हर एक है गंभीर भूमिका
सबके साथ न्याय करूं
हर पल जी भर जी लूं
प्रयास है हर दिन यही
काल चक्र रुकता नहीं
पर अपने ही तर्ज पर
समय के गिटार पर
ट्यून नया बनाना है
गीत नया गाना है
गीत नया गाना है।
By Dhruwa Shankar Prasad

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