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औरत

By Jyotsna Sinha


कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कह जाती हैं ,

ये औरत हैं जनाब ,चुप रहकर भी सब कुछ बता जाती हैं

जन्म से ही अलग सा उसमें हैं एक नूर ,

अपने माँ बाप का एक दिन बनती हैं वो गुरूर

पढ़ लिखकर सपने साकार करेगी ,

बड़े होकर क्या बनना हैं,इसका वो बचपन से विचार करेगी

पर आज भी अनेक बेटियों को कहा देते हैं मौका हम ,

के अपने पैरो पर खड़े होकर बने वो सक्षम

और नाम रौशन करे वो परिवार का

प्रगति में हिस्सा हो उसके भी संसार का

पढाई के साथ साथ वो घर भी संभालेगी,

पारिवारिक और सांसारिक दोनों बोज उठा लेगी

शादी के बाद भी दोनों परिवार को बांधती हैं वो

रिश्तो को जोड़े रखने के लिए अनेक कष्टों को सहती हैं वो

ऑफिस के बॉस से लेकर घर की सास तक ,

सबकी डांट सुनकर भी मुस्कुराती रहती हैं वो ,

के कोई एक बार तारीफ़ तो करदे

बस इस बात के लिए कितना तरसती हैं वो

अनेक प्रयत्नों के बाद भी जब हार जाती हैं वो

ज़िन्दगी के बदले मौत को गले लगाना चाहती हैं वो

पर इसकी भी उसको आज़ादी नहीं हैं,

क्युकी वो एक औरत हैं साहब ,कोई फरियादी नहीं हैं

जिम्मेदारियों से इस कदर वो हैं दबी

के बच्चो से बूढों तक ,उसपर आश्रित हैं सभी

इतनी मुश्किलों के बाद भी वो फिर उठेगी

सपने जो थे उसके अधूरे ,वो पूरा करेगी

फिर एक नयी सुबह होगी

डांट फटकार से ज्यादा दुआ होगी

कर गुजरेगी वो कुछ ऐसा

के चारो तरफ उसकी जय जयकार होगी ..

औरत को भगवान् ने बनाया हैं कुछ ऐसा

उबलते लावे का सैलाब हो जैसा

जब तक वो शांत हैं सबकुछ हैं सुन्दर

क्रोधित होते ही ,ले आती हैं वो बवंडर

माँ,भाभी,बीवी और बहन

इन सभी रिश्तो में वो करती हैं कितना कुछ सहन

पर विपत्ति जब आये अपनों पर ,तो बन जाती हैं काली

और वीरता से देती हैं दुश्मनों की बलि

एक औरत होना आसान नहीं,

फिर भी उसको ,इसका अभिमान नहीं

के लब्ज़ भी कम पड़ेंगे

जब भी लोग औरत की गाथा पढेंगे

मुझे भी गर्व हैं के मैं एक औरत हूँ

शक्ति,सवेदना ,प्यार और बलिदान की मूरत हूँ

अपने परिवार और समाज की एक महत्वपूर्ण ज़रूरत हूँ ..


By Jyotsna Sinha

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