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आदत

By Bareera Masood


बिला तकलीफ़ रहना नहीं आता,

इस आदत को चोढ़ना नहीं आता।


आइने में शक्ल को अपनी अब देखा नहीं जाता,

कुछ है इस शक्ल पर, जो अब अलग किया नहीं जाता।

इन आँखों को अब पढ़ा नहीं जाता

क़तरे इन आँखों के अब बहाऐ नहीं जाते,

क़तरे इन आँखों के अब संभालें नहीं जाते।


जो भी आदतें थी पहले

बुरी थी, या अछी थी,

याद अब मुझसे रखी नहीं जाती।


बातों को तुम्हारी भूलना नहीं आता,

ख़ुशी को अपनी अभी भी ज़ाहिर करना नहीं आता।


क्या सीख़ा सालों में इतने?

जब आप को खुद संभालना नहीं आता।


सिर्फ़ मुझे या तुम्हें भी?

ज़िंदा रहना आता है, मगर ज़िंदगी जीना नहीं आता,


क्यूँकि शायद अब इस तकलीफ़ के बिला रहना नहीं आता।





Aadat


Bila takleef rehna nahi aata,

Iss aadat ko chordhna nahi aata.


Aayne mein shakl ko apni dekha nahi jaata,

Kuch hai iss shakl par, jo ab alag kiya nahi jaata.

Inn aankhon ko ab padha nahi jaata

Qatre in aankhon ke ab bahaaye nahi jaate,

Qatre inn ankhon ke ab sambhaale nahi jaate.


Jo bhi aadatein thi pehle,

Achi thi, ya buri thi

Yaad ab mujhse rakhi nahi jaati.


Baaton ko tumhari bhoolna nahi aata,

Khushi ko apni abhi bhi zaahir karna nahi aata.


Kya seekha saalon mein itne?

Jab apna aap ko khud sambhaalna nahi aata.


Sirf mujhe ya tumhein bhi?

Zinda rehna aata hai magar zindagi jeena nahi aata,


Kyunki shaayad ab iss takleef ke bila rehna nahi aata.


By Bareera Masood





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