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सुधा

By Monika Sha


सुधा के घर में रौनक छायी हुई है। उसके घर में बहुत दिनों बाद खुशी आयी है। पूरा घर खुश हो भी क्यों न , सुधा की शादी जो तय हो चुकी है । सभी सुधा की शादी की तैयारियो में लगे हुए है । शाम के वक्त सुधा के घर के सारे सदस्य अपने हॉल में आकर बैठ गये। सभी अपना काम निपटा कर शाम के वक्त वही आकर बैठ जाते थे और फिर बातों का सिलसिला शुरू हो जाता था। पर आज सब सुधा की शादी के बारे मे ही बात कर रहे हैं। मीता(सुधा की बहन) को इस बात की समस्या है कि शादी में वह क्या पहनेगी । इस समस्या को हल करने के लिए मीता ने अपने लिए एक लहँगा देखना शुरू कर दिया। सुधा की मां को शादी की तैयारियों की चिंता थी । उसके पापा ने जब से लड़के वालों की तरफ से शादी के लिए हाँं सुना तो उनके खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा । वह झूम उठे और रिश्तादारों को फोन कर के शादी तय हो जाने की खुशखबरी दे रहे हैं । रोहित (सुधा का भाई ) , वो तो वहाँ था ही नहीं। वह तो हर वक्त अपने यारों के साथ ही रहता है।


घर में सभी खुशी से झूम उठे हैं और झूमेंगे भी क्यों नहीं ? आखिर बरसों से सुधा की शादी की बात चल रही थी , पर हर जगह से ना ही सुनने को मिलता था। आखिरकार उनकी तपस्या का फल आज उन्हें मिल ही गया । सुधा के परिवार वालों ने सभी का मुँह मीठा करके जश्न मनाया।


इस हाँ से सभी को खुशी हुई। सुधा भी खुश थी। पर बार-बार वह यही सोचकर उदास हो जाती थी कि उसे अब अपना घर छोड़ना होगा। जहाँ उसने जन्म लिया, जहाँ उसने इतने सारे पल बिताए। इन सब को पीछे छोड़कर उसे एक नई दुनिया बसानी होगी , वो भी उस शख़्स के साथ जिसके बारे मे वह कुछ नहीं जानती है। पर उसके घरवाले इस खुशी में इस तरह खोये हुए थे कि उन्हें सुधा की उदासी नज़र ही नहीं आयी।


रात को खाते समय भी सुधा की शादी की ही बातें हो रही थी । खाना खाकर सब अपने कमरे में सोने के लिए चले गए। सुधा भी अपने बिस्तर पर लेट गई। उसके लिए आज का पूरा दिन थकान भरा था। सुबह से वह शादी की बात सुन के पक चुकी थी। उसे शांति चाहिए थी जो उसे अब मिल रही हैं। कुछ देर बाद सुधा भी सो गई।


सुधा के माता-पिता अब भी अपने कमरे में शादी के बारे में ही सोच रहे थे। सुधा की माँ ने कहा, ‘इतनी रात हो गई है। अब क्या सोच रहे हैं आप ?’


सुधा के पिता ने अपनी पत्नी की तरफ देखकर कहा, ‘भगवान का लाख लाख शुक्र है कि इस बार सुधा की शादी तय हो गई है। इतने जगह उसके रिश्ते की बात चली पर हर जगह लड़के वाले के मुंँह से ना ही सुनने को मिलता था। सुधा को देखने के समय तो सब उससे खुश होते थे। पर बाद मे पता नहीं क्यों मना कर देते थे? ऐसी क्या कमी है हमारी सुधा में , कॉलेज पढ़ रही है, खाना बनाना जानती है। दिखने मे भी सुंदर है फिर भी ...।’


सुधा की मांँ बीच मे टोकते हुए बोली, 'छोड़िए इस बात को । ऐसे खुशी के मौके पर ऐसी बातें नही करनी चाहिए । सो जाइए कल बहुत सारा काम भी है।’..और दोनो सो जाते है।


अगली सुबह, सूरज की किरणों ने सभी के घरों में दस्तक दी। पर सुधा के घर मे ये किरणें खुशियों के किरण सी लग रही थी। घर के सभी लोग जाग गये हैं और चहल-पहल शुरू हो गई है। हमेशा की तरह सुधा की नींद चहल-पहल से टूटती है। वह जाग गई थी पर बिस्तर से उठी नहीं । कुछ देर बाद उसके दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी। वह अपने बिस्तर से उठी और दरवाज़ा खोला तो सामने मीता को स्कूल के वस्त्र पहने खड़ी पाई। मीता ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,‘ उठने का इरादा है कि नहीं। दी, अगर इसी तरह आप देर तक सोती रही ना तो आपके सुसराल वाले आपको एक ही दिन मे वापस घर भेज देंगे।’


यह कहकर मीता हँंसने लगी। सुधा जानती थी मीता ने उसके साथ मज़ाक किया है इसलिए उसने भी मज़ाक मे ही कहा,‘ तो मेरे बदले तू क्यो नहीं चली जाती मेरे सुसराल । तुझे तो सुबह जल्दी उठने की आदत है ना।’


मीता ने कहा, "ना बाबा ना आप ही जाइए, मैं तो चली स्कूल! टाटा ।"


मीता के जाने के बाद सुधा भी कॉलेज जाने के लिए तैयार होने लगी। पहले सुधा को कॉलेज जाना उतना नहीं भाता था जितना अब भाता है। पिछले छह महीनों से उसे अपने घर से ज्यादा अच्छा कॉलेज लगता है। क्योंकि एक कॉलेज ही है जहाँ शादी की बात नहीं होती है। वहां वो खुश रहती हैं । सुधा अभी तृतीय वर्ष में है । कुछ महीनों बाद उसका तृतीय वर्ष भी पूरा हो जायेगा ।


नाश्ता करके कॉलेज जाने के लिए सुधा ने अपना बस्ता उठाया ही था कि उसकी माँ ने कहा,‘ यह सवेरे– सवेरे कहाँ जा रही हो ?’


सुधा ने आश्चर्य से कहा,‘ कॉलेज जा रही हूँ। और कहाँ जाऊंगी ? (अपने भाई के कमरे की तरफ देखकर) रोहित कॉलेज जाने के लिए देर हो रही है |’


सुधा और रोहित दोनों साथ कॉलेज जाया करते है । हाँलाकि , सुधा और रोहित के कॉलेज अलग अलग हैं पर उसके माता-पिता रोहित के बिना सुधा को कॉलेज नहीं जाने देते।


रोहित अपने कमरे से ही आवाज़ देता है, "आ रहा हूँ।"


सुधा की माँ उससे कहती हैं, 'बेटी, अब तू कॉलेज नहीं जा सकती है । तेरी शादी होने वाली है । तुझे अब घर गृहस्थी ही देखनी है। तो अब पढ़ाई - वढ़ाई सब छोड़ और घर पर ध्यान दे |’


सुधा ने कहा, ‘पर मै अपना बी ए तृतीय वर्ष पूरा करना चाहती हूँ ।’


इससे पहले सुधा की माँ कुछ कहती उसके पिता और रोहित वहाँ आ चुके थे । इन दोनों को लड़ते देख कर उसके पिता ने पूछा, ‘क्या हो रहा है यहाँ ?"


उसकी मां ने कहा,‘देखिए अपनी बेटी को ,कॉलेज जाने के लिए ज़िद कर बैठी है। बोल रही हूँ शादी होने वाली है पर मान नहीं रही हैं । "


इतने में सुधा अपने आँखो से आँसू पोछते हुए कहती है, ‘पापा, आपने मुझे शादी के लिए कहा। मैने हाँ कह दिया । आप मां को समझाइए ना। कम से कम मुझे मेरा बी ए तृतीय वर्ष तो पूरा करना दे। यह मेरी आप सब से हाथ जोड़कर विनती है।'


सुधा के पिता सख़्त आवाज़ में कहते हैं,‘ सही कह रही है तुम्हारी माँ । और आगे पढ़कर भी क्या करोगी। घर का नाम रोशन लड़का ही करता है। और वैसे भी हमारे यहाँ लड़कियो को ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता है।’


रोहित ने कहा,‘यह क्या कह रहे हैं पापा? पढ़ना सब का हक है। और अगर दी अपनी तृतीय वर्ष पूरा करना चाहती है तो इसमे हर्ज ही क्या है। ऐसा उन्होंने क्या मांग लिया आपसे?शादी के लिए मना तो नहीं किया है दी ने। बस इतना चाहती है कि तृतीय वर्ष पूरा हो जाने के बाद वह शादी करे।’


सुधा के पिता रोहित की ओर देखकर कहते हैं, ‘लड़के वालो को ज्यादा पढ़ी लिखी बहू नहीं चाहिए | उन्हें बस घर-गृहस्थी संभाल सके ऐसी बहू चाहिए।...’


रोहित ने बीच मे टोकते हुए कहा, ‘लेकिन दी अभी तक उस घर की बहू बनी नहीं है। दी अभी इस घर की बेटी है। मेरी बड़ी दी है । और हमेशा रहेगी। और अगर दी चाहती है कि वह आगे पढ़े तो मै हमेशा उनका साथ दूंगा। चाहे दी उस घर की बहू ही क्यों न बन जाए।’


सुधा की माँ रोहित के सामने आकर कहती है,‘ यह क्या बकवास किये जा रहा है तू ? तेरी बहन की शादी होने वाली है। उसे घर देखना होगा।पढ़ाई करके क्या होगा?’


रोहित कहता है,‘तो मुझे भी पढ़ा कर क्या होगा? किसी दिन मेरी भी तो शादी होगी ना?’


सुधा की मांँ ने कहा,‘ तू लड़का है। तू इस घर का चिराग़ है। इस घर को संभालेगा तू।’


रोहित ने हल्की सी हँसी के साथ कहा, ‘तो यह सब दी भी कर सकती है। मीता भी कर सकती है। बल्कि मुझसे बहुत अच्छे तरीके से संभाल सकती है । लड़कियाँ भी अपने पैरो पर खड़ी हो सकती है। अपने परिवार वालो की देखभाल कर सकती है। अगर आप जैसे माता-पिता उसके पास ना हो।’


सुधा की आँखें सजल हो गई। वह अपने भाई को घंटो निहारती रही । उसके एक-एक शब्द मिश्री जैसे मीठे लग रहे थे। रोहित की बात सुनकर सुधा के माता–पिता की बोलती बंद हो गई। सुधा के पिता ने सिर्फ इतना कहा, ‘मैं उन लोगों से बात करके देखता हूँ।’


रोहित ने सुधा को देखते हुए कहा,‘ चलो दी, हमें देर हो रही है। मैं भी देखता हूँ आपको कौन रोकता है।"


रोहित सुधा के आगे चलने लगता है।


अपने भाई की यह बातें सुनकर सुधा को ऐसा लगा मानो उसने सब कुछ पा लिया हो। उसे इतनी खुशी कभी नहीं मिली थी। वह मानती थी कि यह खुशी क्षण भर के लिए है पर वह इस क्षण भर की खुशी को जी लेना चाहती थी। क्या पता ऐसी खुशी दोबारा उसे कब नसीब हो?




सुधा ने अपना बस्ता उठाया और कॉलेज के लिए रवाना हो गयी। पूरे रास्ते भर वह बहुत खुश थी। यह सोचकर कि कम से कम वह बी ए तृतीय वर्ष पूरा करेगी । सुधा का कॉलेज ज्यादा दूर नहीं था। इसलिए वह हमेशा पैदल ही जाती थी।


सुधा अपनी ही धुन में चली जा रही थी कि तभी उसने रोहित की आवाज़ सुनी, ‘कुछ महीने बाद आप चली जाओगी 'दी'! फिर मुझे अकेले ही कॉलेज जाना पड़ेगा । '


रोहित के इस वाक्य मे एक उदासी थी जो सुधा से छिपी नही थी । रोहित भले ही अपने परिवार के साथ ज्यादा वक्त नहीं बिताता है पर सुधा जानती है कि वह अपने परिवार से कितना प्यार करता है।


सुधा ने कहा ," ये तो एक दिन होना ही था। क्या कर सकते है?”


रोहित ने कहा, ‘फिर अगर मुझे किसी से बात करनी होगी तो किस से करूंगा ?’


सुधा ने इस बार मुस्कुरा कर कहा, ‘मैं शादी करके जा रही हूँ। रिश्ते तोड़कर नहीं जा रही हूँ | तुमसे मेरा वही रिश्ता रहेगा जो अभी है । तुम्हे जब भी मुझसे बात करने का दिल करेगा बस एक फ़ोन कर देना ।’


बदले में रोहित ने अपना सिर हिलाकर हामी भरी । फिर दोनों बातें करते-करते कब कॉलेज पहुंँचे पता ही नहीं चला। कॉलेज पहुँचते ही सुधा ने रोहित से कहा, ’‘ अच्छे से जाना। ठीक है! और हां धन्यवाद’ और रोहित एक मुस्कान दे कर वहाँ से अपने कॉलेज के लिए चल दिया । सुधा वहीं खड़ी रोहित को जाते देख रही थी कि पीछे से आकर उसकी सहेली ने उसके आँखो पर हाथ रख दिए और कहा,‘ पहचानो कौन ?’


सुधा ने कहा,‘वर्षा।’


और वर्षा उसकी आँंखों से हाथ हटाते हुए कहती है, ‘तो क्या करते हैं हमारे जीजा जी ?’


सुधा ने एक लम्बी सांस छोड़ते हुए कहती है, ‘घर मे यह सुन - सुन के थक चुकी हूँ मै । अब तू तो शुरू मत हो ।’


वर्षा ने अपने दोनो हाथ ऊपर करते हुए कहा, ‘अच्छा बाबा, ठीक है नहीं बताना है तो मत बता। चल अब क्लास के लिए चलें।’


सुधा और वर्षा जब क्लास में पहुंचते हैं तो उन्हें बड़ी समस्या का सामना करना पड़ता है ।और वह समस्या है कि बैठे कहाँ। इतने ज्यादा छात्राएँ और इतनी छोटी क्लास | यह तो बड़ी नाइन्साफी है। बच्चे ऐसे सिकुड़ के बैठे हैं मानो ठंड का मौसम आ गया हो । जैसे– तैसे सुधा और वर्षा ने अपने लिए बैठने की जगह बना ली । पर वही, सिकुड़ के बैठे क्लास कर रहे थे | सारे बच्चे अब इंतजार मे थे कि कब यह पीरियड खत्म हो । जैसे ही क्लास खत्म हुआ वैसे ही बच्चे इस तरह कमरे से भागे मानो कोई रेस हो रहा हो | लेकिन सुधा और वर्षा कक्षा में ही बैठी रहीं। दोनों ही चुप थीं और कमरे मे फैली शांति को घूँट-घूँट कर अपने अंदर समाये जा रही थी। अचानक सुधा ने देखा कि दरवाज़े से कोई उन्हें देख रहा है। सुधा घबरा गई । सहसा उठी और वर्षा से कहा,’चल वर्षा।’


उसके इतना कहने से ही वर्षा समझ गई कि वह लड़का फिर उसे देख रहा है। उसने दरवाज़े की तरफ देखा तो वहाँं ललित खड़ा था। बेशर्मो की तरह सुधा को घूरे जा रहा था । ललित उन्हीं की कक्षा में पढ़ता है और बदकिस्मती से उसका घर सुधा के घर के पास ही है । ललित सुधा को चाहता है । इसलिए सुधा के लाख मना करने पर भी वह उसे परेशान करता रहता है। लेकिन ललित के लड़ाकू बर्ताव के कारण सुधा उसे पसंद नहीं करती है। कॉलेज में हर किसी से उसका झगड़ा चलता ही रहता है ।और तो और ललित हमेशा सुधा को जबरदस्ती छूने की कोशिश करता रहता है। इसलिए सुधा उससे दूर भागती है।


सुधा और वर्षा कक्षा से निकलने ही वाले होते हैं कि ललित उन दोनों का रास्ता रोक देता है। पहले तो सुधा इधर-उधर देखती है पर जब देखती है कि वह नहीं हट रहा है तो उसने पूछ ही लिया, ‘क्या चाहिए तुम्हें?’


ललित ने बिना नज़रे हिलाये कहा, ‘मुझे जो चाहिए वह तुम अच्छी तरह से जानती हो ।'


सुधा ने कहा, ‘देखो मैं तुम्हें पहले ही बता चुकी हूंँ कि मुझे इन सब मे कोई रुचि नहीं है । मुझे बस पढ़ना है और मैं उसी के लिए यहाँ आती हूँ। और तो और मेरी शादी तय हो चुकी है। इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम मेरा पीछा छोड़ दो।’


इस बात पर ललित ने हँसकर कहा,‘ शादी, वह भी तुम्हारी, हो ही नहीं सकता।’


सुधा कुछ कहने ही वाली थी कि वर्षा ने उसे रोक दिया,‘ बस कर सुधा, किसके मुँह लग रही है । इसके मुंँह लगकर हमारा ही वक्त बरबाद हो रहा है | चल।’


यह कहकर वह दोनों कमरे से बाहर निकल गयीं।| दोनो कुछ देर तक चुप ही थीं । दोनो यही सोच रहीं थीं कि इस घटना पर बात किया जाए या नहीं। यूँ ही चुपचाप चलते-चलते दोनों लॉन में पहुँचीं ।कुछ देर दोनो चुप ही बैठी रहीं। समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या बात करे । पर यह सन्नाटा, आखिर कब तक रहेगा । किसी को तो इस चुप्पी को तोड़ना होगा ? एक लम्बी खामोशी के बाद वर्षा ने ही इसे तोड़ने का प्रयास किया |


उसने सुधा की तरफ देखते हुए कहा, ‘आखिर तुम उसकी शिकायत क्यों नहीं करती ?'


सुधा ने इस पर हल्की सी हँसी हँसकर कहा,‘ शिकायत करने से भी क्या होगा? कितने बच्चों ने उसके ख़िलाफ़ शिकायत किया है, पर क्या हुआ है ? उसके पापा राजनीति के एक ऊँचे पद पर है जिसके कारण वह हर बार बच जाता है। इस बार भी वही होगा।’


वर्षा भी इस बात से पूरी तरह सहमत थी। उसी वक्त दोनों के मोबाइल मे घंटी बजी। वर्षा ने देखकर कहा, ‘हमारी शिक्षक जो अगली क्लास लेने वाली थी वह बीमार है इसलिए आज का क्लास रद्द कर दिया गया है | (सुधा की तरफ देखकर ) तो अब कोई क्लास नहीं है तो छुट्टी हो गई।"


इस सूचना पर वर्षा एक बच्चे की तरह खुशी मना रही थी । सुधा को वर्षा में हमेशा से एक बच्ची ही दिखी जो हर छोटी चीज़ से खुश हो जाती है। उसे हँसते देखकर सुधा भी एक बच्चे की तरह खुलकर हँसने लगी | जब सुधा का हँसना बंद हुआ तो वर्षा ने पूछा,‘ अब घर चले ?’


सुधा ने कहा, ‘नही मैं नहीं जा सकती क्योंकि जबतक मेरा भाई नही आयेगा तब तक में नहीं जा सकती।’


वर्षा ने अपने माथे पर हाथ रखकर कहा ,‘तो तुम्हारे भाई का क्लास कब खत्म होगा?’


सुधा ने सोचते हुए कहा,‘ करीब एक घंटे बाद ।'


वर्षा ने कहा, 'तब तक क्या करें ।’


सुधा ने लाइब्रेरी की ओर इशारा करते हुए कहा, 'लाइब्रेरी।’


वर्षा ने एक उदास बच्चे की तरह कहा, ‘नहीं।’


पर सुधा ने उसकी एक नहीं सुनी और खींचकर लाइब्रेरी ले गयी । करीब एक घंटे तक सुधा किताबो में ही आँख गड़ाए हुई थी। मानो आज ही वह दुनिया भर की सारा ज्ञान बटोर ले जायेगी । और वर्षा बिल्कुल उसके विपरीत , जो किताबो के अलावा वहाँ पड़ी हर चीज़ों को ध्यान से देख रही थी। करीब एक घंटे बाद रोहित भी आ गया । रोहित का मैसेज पाते ही दोनों लाइब्रेरी से निकले । वहाँ से तीनों अपने घर के लिए प्रस्थान कर गए ।


जब रोहित और सुधा घर पहुंँचे तो घर का मौहाल एकदम डरावना लग रहा था । ऐसा लग रहा था जैसे किसी के मरने का मातम मना रहे हों । कॉलेज जाने से पहले जिनके चेहरे खुशी के कारण खिल उठे थे। जिन्हें देखकर ऐसा लगता था कि मानो संसार की सारी खुशी उन्हीं के पास है । अब वही चेहरा उदासी के भाव मे डूब चुका है। मानो इनका सब कुछ लुट चुका हो। सुधा के पिता एक कुर्सी पर माथे पर हाथ रखकर बैठे थे। वहीं दूसरी तरफ उसकी माँ रोये जा रही थी। रोहित ने अपने पिता को चिंता डूबे देखकर पूछा, ‘क्या हुआ? आप सब ऐसे क्यो बैठे है ?’


सुधा के पिता ने इसका जबाब ना देकर उसने सुधा से सवाल किया,‘क्या कॉलेज में तुम किसी से प्यार करती हो ? ’


सुधा चौक सी गई । उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उस पर कोई घिनौना इल्ज़ाम लगाया हो । उसने अपने पिता की आँखो में आँखे डाल कर कहा', 'नही पापा । ऐसा कुछ नहीं है।"


रोहित ने कहा, ‘आखिर बात क्या है यह तो बताइए ।’


सुधा के पिता ने रोहित की तरफ देखकर कहा,‘ लड़के वालों का फ़ोन आया था । उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया है।"


रोहित ने कहा,‘पर उन्होंने तो हाँ कहा था शादी के लिए। फिर क्या हो गया?’


सुधा के पिता ने कहा,‘ अपने बहन से क्यों नही पूछते हो ? बताओ सुधा । ’


सुधा स्तब्ध वही खड़ी रही । उसे ऐसा लगा जैसे उसके पिता को उस पर भरोसा ही नहीं है। यह सोचकर उसकी आंँखे आंँसुओं से डबडबा उठी।


सुधा के पिता ने कहा,‘ लड़के वालो को किसी अनजान नंबर से फ़ोन गया था और उन्होंने लड़के वालों को यह बताया कि सुधा का एक लड़के के साथ चक्कर चल रहा है। किस लड़के के साथ चल रहा है यह नहीं बताया । बहुत पूछने पर पता चला जिस इंसान ने ससुराल वालों को कॉल किया था वह और कोई नही एम.एल.ए का लड़का ललित था। यह कॉल उन्हें कल रात को गया था । मैं अभी ललित के घर से ही आया हूँ । उन्हे चेतावनी तो दी है मैने पर उन लोगो को तुम लोग जानते ही हो । पूरा खानदान लड़ने पर उतारू हो जाते हैं। मुझे तो लगता है कि आज तक जितने भी रिश्ते टूटे है उन सब में ललित का ही हाथ है।’


यह सब बताने के बाद वह चिंता मे खो गए। सुधा अपने पिता के चरणों मे बैठकर रोते हुए कहती है ‘पापा, मैने ऐसा कोई काम नहीं किया , जिसके कारण आपको लज्जित होना पड़े । हाँ, बस, एक गलती की मैंने कि आप सब को ललित के बारे में नही बताया । लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मेरा उसके साथ चक्कर चल रहा है। मैंने कभी उससे प्यार नहीं किया। मेरा भरोसा कीजिए पापा |’


यह कहकर सुधा फूट-फूट कर रोने लगती है। पर उसके रोने पर उसके पिता को तनिक भी दया नहीं आयी। ऐसा लगता है कि उनका हृदय पत्थर का हो गया हो । उन्होंने एक बार भी सुधा की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा। उन्होंने कड़ी आवाज़ में कहा,‘मैने लड़के वालों से बात की है। परसों घर बुलाया है ताकि हम सब बैठ कर इस समस्या का समाधान निकालें।अभी तो कुछ कह नहीं सकते। देखते हैं, क्या होता है उस दिन । पर अब (अपनी तीखी नज़रे से सुधा पर वार करते हुए कहते है) तुम कॉलेज नहीं जाओगी। "


सुधा यह सुनते ही खड़ी हो जाती है। इससे पहले कि वह कुछ कहती तब तक उसके पिता वहाँ से उठकर चल देते है । सुधा को ऐसा लगा मानो उसकी दुनिया ही खत्म हो चुकी है। उसे आज पहली बार एहसास हुआ कि परिवार के मोह ने ही उसके पैरों में बेड़ियाँ बांँध रखी है जिसके वज़ह से वह कभी आगे बढ़ नहीं पायी । अपने वजूद से आज उसे घिन हो रहा है।


धीरे धीरे सब वहाँ से चले गये । वह भी अपने कमरे की तरफ चल दी।

घर में सन्नाटा छा गया था। ना कोई हलचल थी और ना कोई शोर शराबा था। मानो घर के सारे सदस्य गूंगे हो गए हो। ऐसा लग रहा था कि इस घर मे कोई रहता ही नहीं है। सभी अपने काम में लगे हुए थे या यूँ कहें कि इस घटना को भुलाने के लिए कोई काम ढूँढ़ रहे थे । खाली बैठने से उनके मन मस्तिक में सिर्फ इसी घटना का जिक्र हो रहा था। घर के सारे सदस्य अपने जीवन के पन्नो में से इस घटना को मिटाने की भरपूर कोशिश कर रहे थे । ख़ासकर सुधा ! उसके लिए यह घटना उसके ज़हन मे बैठ गयी है । उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके परिवार वाले उसपर भरोसा नहीं करेगे| वह घंटो तक अपने कमरे में बैठी रोती रही। शाम हो गयी पर फिर भी सुधा अपने कमरे से बाहर नहीं निकली। अपने बिस्तर पर वह इस तरह पड़ी थी मानो उसमें जान ही ना हो । एकाएक उसे बाहर बहुत सारे सामान के टूटने की आवाज़ आई | यह आवाज़ सुनकर वह बाहर निकली तो देखा कि कुछ गुंडे उसके घर मे घुसकर सारे सामान को तोड़ फोड़ कर रहे थे । पीछे से और भी गुंडे घर में घुसे जा रहे थे। सुधा बेहद डर गई और अपने माँ के पास जाकर खड़ी हो गई। सुधा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहे है? सहसा उसी में से एक गुंडा रोहित का शर्ट पकड़कर उसे घसीटते हुए घर से बाहर ले गया। रोहित बहुत कोशिश कर रहा था कि वह अपना शर्ट उस गुंडे के हाथ से छुड़ा ले पर उस गुंडे ने उसे इस तरह पकड़ा था कि वह छुड़ा नहीं सका।


उस गुंडे ने रोहित को नीचे गिराते हुए कहा, ‘कहाँ है रे तेरा बाप? सामने क्यों नहीं आता अब ? क्या कह रहा था कि मेरे पूरे खानदान को खत्म कर देगा? (रोहित के पेट मे लात मारता है।) जरा सा पैसा क्या आ गया हैं तुम लोग के पास ,अपनी औक़ात भूल गये । तुम लोग धनी होगे पर यहाँ पर हमारा राज चलता है । समझा।'


इतने में घर के आसपास के लोग पहुंँचे, यह देखने के लिए कि कौन-सा नया खेल चल रहा है। एक दूसरे का खून का प्यासा होते देखना औरों के लिए खेल नहीं तो और क्या है ? भीड़ के लिए तो लोगों को लड़ते देखना मदारी के खेल से भी ज्यादा प्रिय है। लोगों का क्या वह तो सोचते हैं कि कोई मर रहा है तो मरने दो।


सुधा को बहुत चोट पहुँच रही थी अपने भाई को इस दशा में देखते हुए | अपने भाई को बचाने के लिए वह भीड़ की लड़ाई में ही उलझ कर रह गयी | वह भीड़ में ही रहकर भीड़ से लड़े जा रही है पर अपने भाई के पास पहुंच नहीं पा रही है। सिर्फ उसकी ही नहीं, उसकी माँ और उसकी बहन की भी, यही हालत है | सहसा सुधा ने ललित को देखा । ललित , रोहित को बेरहमी से मार खाते हुए देखकर खुश हो रहा था। तब सुधा को सारी बात समझ मे आ गयी कि यह सब उसी के इशारे पर हो रहा है। सुधा के मन में ललित के प्रति पहले से भी ज्यादा घृणा पैदा होने लगी । सहसा उसे एक और घूसे की आवाज़ सुनाई दी । घूसा पड़ते ही रोहित जोर से चिल्लाया।रोहित को कराहते देखकर सुधा तड़प-सी गई और फिर से भीड़ को पार करने की कोशिश करने लगी। तभी उसे अपने पिता की आवाज़ सुनाई दी।वह बोल रहे थे ‘यह क्या हो रहा है यहां?’


फिर उसी गुंडे ने सुधा के पिता को भी भीड़ के बीच से खींच लिया और कहा,‘ क्यों रे, क्या कहा था मेरे पिता के बारे मे ? तुम मारोगे उन्हें ? तेरी इतनी हिम्मत हो गई है। हम उनके बड़े बेटे हैं और यह ललित (ललित को आगे लाते हुए।) हमरा छोटा भाई है ।'


सुधा के पिता इससे पहले कुछ कहते कि एमएलए के बड़े बेटे ने उनको एक जोड़दार थप्पड़ लगाया जिसके कारण उनका पूरा गाल लाल हो गया। अभी तक रोहित ने कुछ नहीं किया था ! किंतु अपने पिता को थप्पड़ खाते देखकर वह भी लड़ने पर आमादा हो गया । वह उठा और एमएलए के बड़े बेटे पर लगातार घूसे बरसाने लगा। पीछे से सुधा के भी रिश्तेदार , जिनकी काफ़ी घनिष्ठता थी सुधा के पिता के साथ, वह लोग भी गुंडों से लड़ने के लिए आ गए।


अब दोनों तरफ से युद्ध के लिए रणभेरी बज चुकी थी । ना गुंडे पीछे हट रहे थे और ना ही सुधा के रिश्तेदार और परिवार वाले। इस युद्ध मे लड़ रहे सारे योद्धा प्रतिद्वंदी को जान से मार देने के इरादे से एक दूसरे पर वार कर रहे थे।


सुधा किसी भी तरह इस झगड़े को रोकना चाहती है। इसलिए वह ललित को ढूंढ़ने लगी। ललित एक कोने मे खड़ा होकर, लोगों को लड़ते देखकर खुश हो रहा था। सुधा उसके सामने जाकर कहती है, ‘यह तुमने क्या किया ?’


ललित नादान बनते हुए कहता है,‘ मैने, मैने तो कुछ भी नहीं किया। मैं तो चुपचाप यहाँ खड़ा होकर देख रहा हूं। लड़ भी नही रहा हूंँ।’


सुधा ने कहा,’तुम मुझे बेवकूफ़ समझते हो। मुझे अच्छी तरह से पता है कि यह आग तुमने लगाया है और यहांँ खड़े होकर, लड़ाई में शामिल न होकर क्या साबित करना चाहते हो कि तुम कितने पवित्र हो। ये मुझे अच्छी तरह से मालूम है। यहाँ तुम इसलिए खड़े हो क्योंकि तुम कायर हो । तुम्हे बस बड़ी–बड़ी बाते करना आता है। और कुछ नहीं। तुम सिर्फ उन्हीं के सामने अपनी वीरता दिखाते हो जो तुमसे कमज़ोर हैं।’


ललित ने कहा, ‘ इतना गुस्सा | पता है पहली बार मैं तुम्हे गुस्से में देख रहा हूँ। तुम गुस्से में बिल्कुल अच्छी नहीं लगती । तुम्हे तो मुस्कुराते रहना चाहिए।’


सुधा कहती है, ‘देखो, बंद करो यह तमाशा | समझे।’


ललित ने कहा, ‘वैसे तुम सही समझ रही हो। मैने ही यह सब किया है। और यह सब मैंने तुम्हे पाने के लिए किया। लेकिन तुम्हारे पिता को हमसे रिश्ता ही नहीं रखना । तो इस गलती की सज़ा तो उन्हें भुगतनी ही होगी। अब देखो ! हम अपने घर में सबसे छोटे हैं तो सबका प्यार भी हम पर ज्यादा है। बचपन से ही हमारी हर ख्वाहिश पूरी हुई है। पर जब तुम्हारे पिता ने हमारे घर आकर धमकी दी तो हमें अच्छा नहीं लगा। और हमने वही किया जो हमें सही लगा। अब ये सब तुम देख रही हो।’


सुधा कुछ कहने ही वाली थी कि बीच में रोहित आकर ललित पर घूसा बरसाने लगा। रोहित ललित को मारने का मौका ही नही दे रहा था। लेकिन बाद मे ललित को मौका मिला तो वह भी चुप नहीं बैठा। फिर दोनों के बीच ज़बरदस्त मारपीट हुई। और सुधा उन्हें रोकने की भरपूर कोशिश कर रही थी। लेकिन रोहित पर खून का नशा छाया हुआ था । वह तब तक नहीं रुकना चाहता था जब तक वह ललित को मौत के मुँह ना सुला दे। सुधा रोहित को रोकने की कोशिश कर रही थी पर रोहित ने सुधा की एक नहीं सुनी। उसी वक्त रामप्रसाद दास आए।


रामप्रसाद दास सुधा के ही बिरादरी के थे।ऊपर से सुधा के पिता उनके व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण ग्राहक । दूसरी ओर उनकी बेटी का विवाह एमएलए साहब के बड़े बेटे से हुआ है। उन्होंने एमएलए से रिश्ता भी इसलिए बनाया ताकि समाज में उनका वर्चस्व कायम रहे। किंतु अब वह असमंजस में पड़ गए , साथ दें तो किसका? अब वह अपने बिरादरी को भी धोखा नहीं देना चाहते थे और ना ही एमएलए साहब के साथ अपना रिश्ता ख़राब कर सकते है। सुधा के पिताजी और एमएलए दोनो इंसान रामप्रसाद दास के जीवन की गाड़ी के दो पहिए हैं। इनमें से अगर एक भी पहिया छूटा तो वह अपाहिज हो जाएँगे। इसीलिए उन्होंने इस मामले को जैसे तैसे करके शांत करवाया ।


रामप्रसाद दास ने कहा,‘भाई साहब आप अपने रिश्तेदारों को कहिए अपने-अपने घर जाएं। (एम.एम.ए के बड़े बेटे की तरफ देखते हुए) बेटा तुम भी अपने घर जाओ । बेटी राह देख रही होगी ।


वहाँ से दोनो विरोधी अपने-अपने टोली को लेकर प्रस्थान किए । इस युद्ध मे लोग भले ही एक दूसरे के जान के दुश्मन हो गये थे पर खुशी की बात यह है कि किसी की जान नहीं गई ।


घर मे आते ही रोहित और सुधा के पिता की मरहम पट्टी की गई। घर के सारे सदस्य हॉल में ही बैठे थे। राम प्रसाद दास भी वही बैठे थे। सुधा के पिता बहुत देर तक अपनी आँखे नीचे किए हुए बैठे थे। कोई कुछ नहीं बोल रहा था ।


सहसा रोहित ने ही कहा, ‘बस, बहुत हो गया । अब मै इन लोगों को सबक सिखाऊँगा। हम इन पर केस करेंगे।’


केस का नाम सुनते ही रामप्रसाद के चेहरे की हवाईयाँ उड़ने लगी । उन्हें यह चिंता सताने लगी कि जिससे बचने के लिए इस झगड़े को सलटाया अब वही होने जा रहा है ।


उन्होंने जल्दी-जल्दी में कहा, ‘नहीं– नहीं बेटा , ऐसी गलती मत करना।’


सबकी नज़रें उनकी तरफ गई। रोहित ने कहा, ‘क्यों ना करूँ ?’


रामप्रसाद ने सबकी नज़रों से बचते हुए कहा ,‘देखिए भाई साहब, इन केस–वेस के चोंचले मे ना फँसिये । एक तो पता नहीं न्याय कब मिलेगा ? दूसरा इसमें पैसे और वक्त दोनों बरबाद होंगे। पता चला पैसे खर्च करने के बाद भी, न्याय नही मिला। तब क्या करेंगे? ऊपर से हो सकता है कि वह लोग भी आप पर केस कर दें । क्योंकि लड़ाई तो आप लोगो ने भी जमकर किया है और वह तो है ही एम.एल.ए । कुछ भी कर सकता है। क्या पता, कुछ नुक्स निकल कर आपको ही इस केस मे फँसा दे । फिर तो अपके बेटे की भी जिदंगी बरबाद हो जायेगी। और ज़रा सोचिए कौन करेगा आपकी बेटियों से विवाह।’


रामप्रसाद की बातें सुनकर सब इस बात पर गंभीरता से विचार करने लगे । और धीरे-धीरे यह डर सबके मन-मस्तिक पर हावी हो गया ।


सुधा की माँ ने डरते हुए कहा, ‘भाई साहब बिल्कुल ठीक कह रहे हैं । कुछ हो गया तब। आजतक कितने लोगों ने केस किये है । कुछ हुआ है क्या उनका ? मैं अपने बच्चों की जिदंगी को दाँव पर नही लगा सकती। ’


सुधा के पिता ने कहा,‘ तो ऐसे में क्या करें ?’


रामप्रसाद ने तुरंत जवाब दिया,‘ मेरी मानिए तो भाई साहब आप लोग आपस मे ही यह झगड़ा सुलझा लीजिए ।’


सुधा के पिता ने कहा,‘ देखिए हमें उनसे कोई रिश्ता नहीं करना है। बस हमे शांति से रहने दें। आप तो उनके रिश्तेदार हैं। उन्हें बता दीजिएगा कि इस मामले मे ना हम कुछ करेंगे और ना ही वह लोग । इस मामले को यहीं रफा-दफा करे । पर अगली बार ऐसा कुछ किया तो हम भी चुप नहीं रहेंगे । '


रामप्रसाद ने खुशी को छुपाते हुए कहा ‘हाँ हाँ क्यों नहीं। मैं उन्हें समझा दूंँगा । आप निश्चिंत रहें। अच्छा भाभीजी अभी मैं चलता हूंँ।’


रामप्रसाद दास जब सुधा के घर से निकले तब उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उनके चेहरे पर उभरकर आने वाली मुस्कान देखकर ऐसा लग रहा था मानो किसी गरीब को पैसों से लदा हुआ सूटकेस मिल गया हो। रामप्रसाद यूँ ही मुस्कुराते हुए अपने घर की तरफ चल दिये।


इस हादसे के बाद सुधा का पूरा परिवार आपस में अजनबी की तरह रह रहे थे। कोई किसी से कुछ नहीं बोल रहा था। सुधा को इस माहौल में रहना बिल्कुल पसंद नहीं है। इस मौहाल से वह हमेशा से भागती आई है। मीता और रोहित को पढ़ाई के लिए घर से बाहर जाते देखकर उसका मन कॉलेज जाने के लिए तड़प उठा। मीता और रोहित के कालेज जाने के बाद वह बिल्कुल अकेला महसूस कर रही थी। माँ तो अपने कामों मे लगी रही और पिता! उनकी नाराज़गी दूर ही कहाँ हुई थी। वर्षा ने भी उसे कॉल किया था पर उसने उसका उत्तर नहीं दिया। वह अपने आप में सहमी हुई है। किसी और के नज़रो का सामना करना या उसके प्रश्नों का जवाब देना, इतनी हिम्मत अब सुधा में नहीं है। वह वर्षा का फ़ोन उठाती भी तो उससे क्या कहती ? उसके मन में उलझन ही उलझन है। बीती बातों से व्यथित मन को शांत करने के लिए वह छत पर चली गई।


दोपहर का समय था । सूर्य की किरणें सीधे सिर पर पड़ रही थी। धूप की तीव्रता ऐसी कि आँखे चौधिया जाए। छत पर रखे गमलों में छोटे-छोटे फूल रोपे गए थे जो उस छत की शोभा बढ़ाते थे। पर सुधा अपने में ही मग्न थी। वह चाह कर भी बीते दिन को भूल नही पा रही थी। उसकी आँखें आँसुओं से डबडबा गयी थी, तभी उसने नीचे से मीता की आवाज़ सुनी। मीता छत की तरफ ही आ रही थी। सुधा ने झट से अपने आँसुओं को पोछ डाला।


मीता ने छत पर पहुँचते ही कहा, 'आप यहाँ हैं दी।" सुधा ने मीता से आँखे चुराते हुए कहा,' तू स्कूल से कब आयी?"


मीता ने कहा, ‘अभी-अभी। पर आप इतनी धूप में क्या कर रही हो। "


मीता ने गौर से सुधा का चेहरा पढ़ा और उसे यह एहसास हुआ कि सुधा रो रही थी। उसने कहा, ‘यह क्या दी आप रो रही है ? "


सुधा ने मीता की ओर देखा और कहा ,‘मीता तू कितनी बड़ी हो गई है।’ जिसे कभी किसी की कोई परवाह ही नहीं रहती थी? आज वह किसी का चेहरा भी पढ़ रही है । (सुधा की आँखे छलछला उठीं।)


मीता ने कहा, 'आप कल की बात को लेकर रो रही हैं। कोई चाहे कुछ भी कहे पर मुझे पूरा विश्वास है कि आप ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती हैं दी।"


अपनी छोटी बहन के मुँह से यह विश्वास भरा शब्द सुनकर उसे कितना सुकून मिला यह वही जानती है। सुधा ने अपनी बहन की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा, 'नीचे चलते हैं।'


दोनों बहनें सुधा के कमरे में बैठकर देर तक बातें करती रहीं। बहुत दिनों बाद दोनों बहनें बैठी थीं, तो बहुत सारी बातें तो होनी ही थीं। कुछ देर बाद रोहित भी आ गया। अपनी दोनों बहनों को साथ में बैठे देखकर कहा "अच्छा तो आप लोग मुझे भूल गयीं।"


फिर रोहित भी उनके गैंग में शामिल हो गया। तीनों शाम तक वही पर ढेरा जमाये रखे। तीनों बातो बातो मे खुलकर ठहाके मारने लगीं। अगर कोई नहीं हँस रहा हो तो उन्हें तब तक गुदगुदी लगाते जबतक वह हँसने ना लग जाये। सुधा का कमरा फिर से जगमगा उठा था। चारों ओर हर्ष निनाद ही छाये हुए थे। इस तरह सुधा का शाम हँसते-हँसते गुजर गया ।


एक काली अधियारी रात किसी के भी दिल को डर से कंपकपाने के लिए काफ़ी है। खाना खाते वक्त सुधा के दिल मे भी वैसा ही डर था। उसे डर था उस बात का जो कल होने वाला था । उसे खुद नही पता था कि कल क्या फैसला होगा।


सुधा के पिता ने कहा, 'कल हरिराम प्रसाद और उनके बेटे विजय आ रहे हैं। सुधा की शादी की बात करने के लिए। कल दोपहर तक आ जायेंगे।'


इतना कहते ही वो खाना खाकर उठ गये। बाकी सदस्यों ने भी कुछ नहीं कहा और खाना खाकर अपने कमरे की तरफ प्रस्थान कर दिया। सुधा भी अपने कमरे में चली गई। रात काफ़ी हो चुकी थी पर सुधा को नींद आने का नाम ही नहीं। रात भर उसे इसी बात की चिंता सताने लगी कि आने वाला सवेरा उसके जीवन में कौन-सा रंग लेकर आएगा। रात भर वह करवटें बदलती रही। एक पल के लिए ही सही पर वह चाहती थी कि यह समय यहीं रुक जाये! और सवेरा हो ही ना। पर किसी के चाहने से क्या होता है। सवेरा तो होना ही था और हुआ भी।


रात की इस अँधियाली को सूर्य ने अपने प्रकाश से प्रकाशित कर दिया। फिर चारो ओर रोशनी ही रोशनी छा गई। सुधा के लिए इस रोशनी का कोई मतलब ही नहीं था। उसके जीवन में वैसे ही अंधेरा छा चुका है। तो अब इस बाहर की रोशनी से उसका कोई सरोकार नहीं रहा। सुधा धीमी गति से अपना सारा काम कर रही थी। सुबह तो किसी तरह मेहमान के आने की तैयारियों में बीत गया पर दोपहर है कि सुधा के मन को जलाए जा रही है। जैसे-जैसे वक्त बीत रहा था, सुधा का मन व्यथित होता जा रहा था। उसे इतनी बेचैनी थी मानो उसका बारहवीं कक्षा का परिणाम घोषित होने वाला हो। अगर अच्छे अंक नहीं आए तो अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं मिलेगा। पर जीवन का यह परिणाम पत्र तो उस बारहवीं के परिणाम पत्र से अधिक महत्व रखता है।


सुधा के पिता ने अपनी पत्नी को आवाज़ लगाते हुए कहते हैं, ‘मेहमान आ गये ।'


तभी सुधा की मां सुधा को आंखो से इशारा करके यह संकेत देती है कि सब सुधा के कमरे मे जाएं। सब सुधा के कमरे की तरफ चल दिये।


सुधा, मीता और रोहित सब सुधा के कमरे में बैठकर अपने पिता और मेहमानों के बीच हो रही बातों को सुन रहे थे। किस तरह उनके पिता लड़के वालो की खुशामद कर रहे है? प्रार्थना कर रहे हैं। सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। और यह क्यों कर रहे हैं? बस इसलिए कि विवाह के लिए लड़के वाले मान जाएं। लेकिन वे मानने को राजी नहीं हो रहे । फिर भी उनको इज़्ज़त दी जा रही है। किसलिए? क्योंकि वह लड़के वाले हैं। क्या इंसानियत मर गई है उनमे ? सुधा को उनसे घृणा होने लगी है। मानो उनका स्पर्श भी सुधा को अपवित्र कर देगी।


तभी कमरे के अंदर सुधा की माँ आई। और सुधा को अपने साथ बाहर ले गई। सुधा अपनी नज़रें नीची की हुई लड़के वालों के सामने आ रही थी। सुधा लड़के के ठीक सामने रखी सोफा पर बैठ गई। उसने हल्की सी नज़रें ऊपर करके लड़के को देखा। लड़का काला कोट पहने हुए तन के बैठा था। सुधा ने घृणा से अपनी नज़रे हटा ली ।


सुधा के पिता ने सुधा से कहा, 'बेटा इन्हें वह सारी बात बता दो।'


सुधा ने कहना आरंभ किया। वह विस्तार पूर्वक सब कुछ बता रही थी। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रही थी उसकी आँखों में आँसुओं का बोझ बढ़ता ही जा रहा था। वह बार-बार आँसू पोछती और बोलती जाती। जब उसने सारी बात बता दी तो उसके पिता ने कहा,‘ बेटा अब तुम अपने कमरे में जाओ।'


यह कहकर उन्होंने अपनी पत्नी को इशारा किया। धीरे-धीरे वह सुधा को लेकर कमरे की तरफ चली गई। कमरे में आते ही वह फूट-फूटकर रोने लगी। मीता और रोहित उसे धीरज बँधाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे। उन्होंने बड़ी मुश्किल से सुधा को चुप कराया। तीनों कुछ देर तक ऐसे ही बैठे बाहर की बातें सुन रहे थे । सहसा तीनों चौक उठे जब लड़के वालो ने यह शर्त रखी कि शादी तभी होगी जब पहले से दोगुना दहेज देंगे। यह सुनते ही मीता ने कहा, 'यह तो हद है।'


रोहित ने गुस्से में कहा, 'लड़के वाले हैं तो क्या कुछ भी माँग लेंगे? वैसे भी पहले से ही इतना कुछ दे रहे है। और यह और ज्यादा दहेज की मांग कर रहे है। हद है ?"


सुधा कुछ नहीं बोली । वह बस सुनती रही अपने पिता का गिड़गिड़ाना। पहले तो उसके पिता ने इस माँग पर आपत्ति जताई। पर जब देखा कि यह लोग एक पैसा भी कम करने का इरादा नहीं रखते हैं। तो उन्होंने उनके सामने हार मान ली और उस माँग को स्वीकार कर लिया। । सुधा अपने पिता का गिड़गिड़ाना सुन रही थी। सुधा सोच रही थी कि क्या लड़की होना इतनी बुरी बात है? क्या लड़की होना अभिशाप है ? सुधा जिस गुस्से को इतने दिनों से दबाये जा रही थी आज वह अपने शिखर पर पहुँच गया। सुधा का चेहरा गुस्से से इस तरह तमतमा रहा था मानो किसी भी वक्त ज्वाला फट सकती है। सुधा अब कुछ नहीं सुनना चाहती थी। वह बस उन सब का सर्वनाश करना चाहती थी जिन्होंने उसके साथ अन्याय किया है। अचानक से सुधा उठी और कमरे के बाहर चल दी। और यह सब एक क्षण में हुआ कि मीता और रोहित को उसे रोकने का समय ही नहीं मिला। मीता और रोहित भी सुधा का पीछा करते हुए कमरे से बाहर आ गए।


बाहर बैठे लोग अपने ही बातो में मग्न थे। सुधा के आने की आहट भी उन्हें नहीं मिली। उन्हें देखकर सुधा रोब के साथ जोर-जोर से ताली बजाना शुरू कर दी। सब की नज़रें एक पल के लिए सुधा पर थम सी गई थी। इस बार सुधा ने अपनी नज़रों को नीचे नहीं किया। बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ उनसे नज़रें मिला रही थी। उसकी आँखों में रोष था। उसके इस व्यवहार को देखकर सब खड़े हो गये। सुधा हरिराम प्रसाद पर अपनी आँखे टिकाते हुए एक व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा,' बस यही कीमत लगाई है आपने अपने लड़के की ? आपको तो और माँग करनी चाहिए।'


यह सुनकर सब आश्चर्य चकित रह गये। हरिराम प्रसाद और उनके बेटे तिलमिला उठे थे। उन्हें लगा मानों उनके पैर के नीचे से जमीन खिसक गई हो।


हरिराम प्रसाद ने कहा, 'यह क्या कह रही हो ?'


सुधा ने गंभीर स्वर में कहा, 'वही जो आपने सुना। सही तो कह रही हूँ मैं। यह दहेज माँगकर आप अपने बेटे को बेच ही तो रहे हैं।'


लड़के ने पूछा,' कैसे ?’


सुधा ने अपनी नज़रें लड़के की तरफ करते हुए बहुत गौर से देखा मानो कुछ याद करने की कोशिश कर रही हो और कहा, 'तुम्हारा नाम क्या था ? एक मिनट, अजय।'


लड़के ने तुरंत कहा, 'विजय।'


सुधा ने कहा, ' जो भी हो। क्या फर्क पड़ता है? पर बात यह है कि तुम्हारे पिता तुम्हें बेच रहे हैं। और शादी के बाद तुम्हे इस घर में रहना होगा।'


विजय को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह कुछ देर तक मौन रहा । सुधा उसके जवाब का इंतजार कर रही थी पर जब वह कुछ नहीं बोला तो सुधा ने आगे कहना शुरू किया,’ इसे मै एक उदाहरण देकर समझाती हूँ। हम जब भी कोई वस्तु खरीदने दुकान मे जाते हैं, तो हम पैसे लेकर जाते हैं। हम उन्हे पैसे देते है तब वह दुकानदार हमें वह सामान देता है। इस मामले में भी वैसा ही है | हम पैसे दे रहे हैं तुम्हारे पिता को, तो बदले में तुम्हारे पिता तुम्हें हमें सौंपेंगे।'


सुधा विजय के सामने वाले सोफे पर मालकिन की तरह बैठती है। और सब उसे आश्चर्यचकित होकर देखते रहते हैं। तभी सुधा विजय से पूछती है, 'तो अजय ।'


विजय अपना नाम सुधारने के लिए बोलने ही वाला होता है कि सुधा ने अपना एक हाथ उठाकर उसे रुकने का इशारा करते हुए कहती है, ‘जो भी हो। मैंने तो तुमसे कुछ पूछा ही नहीं है। तुम खाना तो बना लेते हो ना ? साफ़-सफ़ाई तो कर लेते हो ना? अच्छा तुम यह सब छोड़ो। तुम यह बताओ कि तुम कहाँ तक पढ़े हो ?’


विजय बौखला सा गया था वह तैश में आकर चिल्लाया " यह क्या बोले जा रही हो तुम? तुम्हारा होने वाला पति हूँ मैं।'


सुधा ने हँसते हुआ कहा, 'एक पल के लिए मैंने तुम्हें अपनी जगह पर खड़ा कर दिया तो इतना गुस्सा आ गया तुम्हें तो ज़रा सोचो कि उस समय मुझ पर क्या बीती होगी, जब तुम सब मिलकर मेरा सौदा कर रहे थे। मुझसे यह सारे सवाल पूछे जा रहे थे। और किस हक से तुमने यह कह दिया कि तुम मेरे होने वाले पति हो ? जबकि तुम्हें अपने होने वाली पत्नी पर रत्तीभर भी विश्वास नहीं है। शादी से पहले तुम मुझ पर शक कर रहे हो तो मै कैसे मान लूँ कि शादी के बाद तुम मुझपर शक नहीं करोगे ?'


हरिराम प्रसाद को जब कुछ नहीं सूझा तब उन्होंने सुधा के पिता से कहा, 'यह कैसी बातें कर रही है आपकी बेटी ? यह तो हमें अपमानित कर रही है।'


सुधा के पिता जो अब तक कुछ नहीं बोल रहे थे सहसा इनकी बात सुनकर उन्होंने कहा, ‘सुधा तुम अपने कमरे में जाओ।'


सुधा की माँ ने कहा, 'सुधा चल कमरे में।'


पर तब भी सुधा अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई तो सुधा के पिता ने चिल्लाकर कहा,' सुधा जाओ अपने कमरे में।'


इस पर सुधा ने उनसे भी दोगुनी आवाज़ में कहा, 'चिल्लाये मत।'


सुधा इस तरह हरिराम प्रसाद को देख रही थी मानो अपनी नेत्रों से ही उसे भस्म कर देना चाहती हो। सुधा ने क्रोधित होकर कहा, 'अपमान तो आप सब ने मेरा किया है। इतने दिनों से मेरा अपमान ही हो रहा था। (अपनी पिता की तरफ देखते हुए) यह जो मेरे पिता हैं, उन्हें ही मुझ पर यानी अपनी बेटी पर तनिक भी विश्वास नहीं है। जब मेरे अपने ही मुझ पर विश्वास नहीं कर रहे तो परायों से उम्मीद करना ही बेकार है। (सुधा की आँखों मे आँसू भर आते हैं ।) इनके लिए तो मैं सिर्फ एक बोझ हूँ। (अपने पिता के सामने जाकर कहती है।) जन्म लेते वक्त ही आपने मुझे क्यों नहीं मार डाला ?’


सुधा उन सबके सामने फूट-फूटकर रोने लगती है। पर किसी के पास यह हिम्मत तक नहीं थी कि वह सुधा को चुप करा सके । सब खामोश खड़े थे। तभी सुधा अपनी आँखों से आँसू पोछती है और एक लम्बी साँस लेने के बाद कहती है,'बहोत हो चुका अब और नहीं। आज से बल्कि अभी से मै अपनी जिंदगी का निर्णय खुद लूँगी। किसी और के हाथ में मै खुद को नहीं सौंप सकती (विजय की तरफ देखते हुए) उस इंसान के हाथ में तो बिल्कुल भी नहीं जिसे अपनी होने वाली पत्नी पर भरोसा ही ना हो।


हरिराम प्रसाद गुस्से में आकर कहता है, ' बहुत देखे तुम जैसी लड़की को। हमे यहाँ रिश्ता करना ही नहीं है। चल विजय।'


हरिराम प्रसाद और विजय जाने वाले होते ही है कि सुधा कहती है, ‘जाइए दरवाज़ा खुला है। क्योंकि आपलोग से बदलाव की उम्मीद भी नहीं रखती मैं। पर एक बात आप भी जान लीजिए की अगर कोई आपके ख़िलाफ़ दहेज लेने पर केस कर दे तो उसके बाद आपके लड़के और आपके साथ क्या होगा यह आपका बेटा अच्छी तरह से जानता है। पर खुशी मनाइए वह शख़्स मै नहीं हूं। इसलिए आपके लिए बेहतर यही होगा आप अपने बेटे को लेकर यहाँ से चले ही जाइए। (हाथ जोड़कर) धन्यवाद ।'


हरिराम प्रसाद अपना मुँह ऐठ कर रह जाते हैं। वह और उनके बेटे बिना किसी से कुछ कहे सीधे दरवाज़े की तरफ चल देते हैं। सुधा के पिता उन्हें रोकने के लिए उनके पीछे-पीछे जाते हैं।


सुधा के पिता हाथ जोड़े याचना भाव से कहते हैं, ‘बच्ची है, उसकी बातों को दिल पर मत लीजिए। नादान है। आप यह रिश्ता मत तोड़िए। "


पर हरिराम प्रसाद और विजय इस तरह चलते जाते है मानो उन्हें कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा हो। सुधा के पिता दरवाज़े पर जाकर रुक जाते हैं। पर उन्होंने प्रार्थना करना नहीं छोड़ा। वह तब तक याचना करते हैं जब तक लड़के वाले उनके आँखों के सामने से ओझल ना हो गए।


सुधा के पिता का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा था। आज सुधा ने उनके बरसों की पूजा में विघ्न डाल दिया। वह क्रोध में आकर सुधा सामने खड़े हो गये। लेकिन सुधा उनके सामने मुस्कुरा रही थी अपने विजय पर, अपनी हिम्मत पर । वह अपने पिता का गुस्से से लाल हुए चेहरे को सामने देखकर भी उसके चेहरे से मुस्कान नहीं गई। उसका यह मुस्कुराता हुआ चेहरा सुधा के पिता के गुस्से की आग में घी डालने का काम कर रही थी।


सुधा के पिता ने क्रोधित होकर कहा, 'यह तुमने क्या किया ?"


सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा, 'वही जो इतने सालों से मुझे करने का दिल कर रहा था लेकिन आपके और समाज के डर के कारण कभी किया ही नहीं। पर आज वह डर खत्म हो चुका है।'


सुधा की इन फ़िजूल बातो से उनका गुस्सा इतना बढ़ गया कि उन्होंने उस पर हाथ उठा दिया। पर वह हाथ सुधा के गाल पर पड़े उससे पहले ही सुधा ने उनके हाथ पकड़ लिये। अपने पिता से नज़रें मिलाती हुई कहती है, 'ऐसा करने का सोचिएगा भी मत। अब मैं पहले वाली सुधा नहीं रही जो आपके एक थप्पड़ के डर से चुप हो जाऊं। किसी को चुप कराने के लिए आप यही कर सकते हैं। औरतों पर अत्याचार। और कुछ नहीं कर सकते हैं आप। "


सुधा की माँ सुधा को चुप कराने के लिये कहती है, ‘सुधा, यह क्या तरीका है अपने पिता से बात करने का ? अभी माफ़ी माँगो।'


सुधा अपने पिता का हाथ छोड़ते हुए कहती है, 'देखा ( अपनी माँ की तरफ देखते हुए) मै नहीं माँगने वाली माफ़ी। कभी नहीं।’


कुछ देर तक सुधा और उसके पिता एक दूसरे पर नज़रों से वार करते रहे। पर जब सुधा के पिता को यह एहसास हुआ कि उनकी हार निश्चित है तो उन्होंने अपने कमरे में जाना ही बेहतर समझा।


सुधा के पिता के कमरे में जाने के बाद सुधा की माँ ने कहा,‘ मिल गई खुशी तुझे। यही तो तू चाहती थी ना?"


सुधा ने भी सीधा जवाब दिया, ‘हांँ मिल गई खुशी मुझे। यही चाहती थी मैं। देखा जाए तो मैने कभी इस शादी के लिए हामी भरी ही नही थी। वह तो आपके और पापा के दबाव के कारण मैंने शादी के लिए हांँ कर दी। मैं तो कभी शादी करना चाहती ही नही थी। रोज़-रोज़ मेरे सामने शादी की बात कर-कर के मेरा दिमाग ख़राब कर दिया था। इस से पीछा छुड़ाने के लिए मैने हाँ कह दिया। लेकिन अब लगता है कि उस समय हांँ कहकर मैने बहुत बड़ी गलती की थी | मुझे हाँ कहना ही नहीं चाहिए था।'


सुधा की माँ ने कहा,‘तो ज़िंदगी भर हमारे माथे पर बैठे रहना चाहती है।’


सुधा ने कहा,‘ नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूँ।'


सुधा की माँ ने कहा,‘ देख सुधा बहुत बोल रही है तू ? बस कर।चुपचाप जो तेरे पिता कह रहे हैं वही कर, समझी।’


सुधा ने नज़रे फेरते हुए कहा, ‘नहीं, मै वही करुगी जो मैं चाहती हूंँ।


सुधा की माँ ने कहा, "पागल हो गई क्या? समझ नहीं आ रहा है तुझे? (रोहित के पास जाकर) समझा जरा अपनी बहन को।दिमाग ख़राब हो गया है इसका।’


रोहित ने सुधा की तरफ देखते हुए कहा, ‘दी ने जो भी किया, सही किया। मैं दी की हर बात से सहमत हूँ।’


सुधा की माँ कहती है, ‘अच्छा तो हम ही गलत हैं। हम तो तुम्हारी दी की बुराई ही चाहते हैं ना ? देखो तुम्हारे पिता ने तुम्हारी दी के लिए इतना अच्छा रिश्ता ढूंँढा है और इसने (सुधा की तरफ ऊँगली करते हुए) सब ख़राब कर दिया।’


मीता ने कहा, ‘अगर अच्छा रिश्ता होता तो इतने दहेज नही माँगते माँ । उन्हें सिर्फ दहेज से मतलब है, दी से नहीं । और दी ने बहुत अच्छा किया रिश्ता ठुकरा कर।’


सुधा ने अपनी माँ के सामने आकर कहा, ‘साफ़ है माँ ! मैं आपकी तरह ज़िदंगी नहीं जी सकती। किसी के सामने आवाज़ न उठाकर, पति से मार खाते हुए भी जीते रहना मुझसे नहीं होगा। मैं आत्मसम्मान के साथ जीना चाहती हूँ। और इसी में मेरी खुशी है।'


सुधा की माँ ने सबकी ओर नज़र फेरा और कहा,‘ या तो तुम लोग ज्यादा पढ़ लिख के पागल हो गए हो या हमे पागल बना रहे हो। मैने तो पहले ही कहा था मत पढ़ाइए इतना सबको। ज्यादा पढ़ लिख लेने से लोग पागल हो जाते हैं। लेकिन मेरी सुनता कौन है। अब देख लो नतीजा।’


मीता कुछ कहने वाली होती है कि उसकी माँ गुस्से मे कहती हैं,‘चुप, बस बहुत हो गया । समझने वाले औलाद नहीं हो तुमलोग। तंग आ चुकी हूँ मैं तुमलोगो से। " ऐसा कहकर वह भी अपने कमरे में चली जाती है।


सुधा वहीं खड़ी उन्हें अपने कमरे में जाते देख रही थी। उनके जाने के बाद मीता और रोहित भी अपने कमरे में चले गए। सब के जाने के बाद सुधा की नज़रें दरवाज़े की तरफ गई। वह दरवाज़ा जो खुला हुआ था। हमेशा सुधा खुले दरवाज़े को देखकर उसे बंद कर देती थी। पर आज उसका मन दरवाज़े को बंद करना नहीं चाहता था। सुधा दरवाज़े की ओर देखे जा रही थी। वह बंद दरवाज़ा आज अपने स्वतंत्रता के बीच आए विघ्न जैसा लगा रहा था जिसे आज उसने उसे हमेशा के लिए खोल दिया और अपनी स्वतंत्रता को हासिल कर लिया। वह स्वतंत्रता जो दिखने में आसान है पर उसे पाना उतना ही कठिन। आज तक अपने समाज और अपने परिवार के भय से वह अपनी खुशी और इच्छाओं का गला दबाये जा रही थी। पर अब वह उस भय के कारागार से बाहर निकल आई। इतना आगे कि अब वह पीछे देखना भी नहीं चाहती है। इतने दिनों से जिस सुधा से वह भाग रही थी आज उसी के पास पहुँच चुकी है। सुधा प्रसन्न है अपनी इस विजय से। और यही प्रसन्नता उसे राहत की सांस दे रही है। वरना वह तो कब की थक चुकी थी लोगों के तरीके से जीते-जीते। पर अब वह अपने तरीके से जीना चाहती है। अपनी ज़िंदगी को एक नया मतलब देना चाहती है। वह हमेशा ऐसे ही खुश रहना चाहती है। सिर्फ और सिर्फ, खुश।


सुधा देर तक उस खुले दरवाज़े को देखती रही और मुस्कुराती रही। यह मुस्कुराहट उसके स्वतंत्रता का जश्न मना रही थी। उसके विजय की घोषणा कर रही थी। फिर सुधा भी अपने कमरे मे वापस जाने के लिए मुड़ी। धीरे धीरे सुधा भी हँसती गुनगुनाती हुई अपने कमरे में चली गई।


By Monika Sha



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