सपना
- Hashtag Kalakar
- Dec 12, 2025
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By Varsha Rani
तेरे अस्तित्व का हिस्सा थी मैं नौ माह,
तू तो देने वाली थी मुझे जीवन की नई छाह ?
वो जो गायीं थी लोरियां, बुने थे सपने,
वो सिर्फ तेरे नहीं, मेरे भी थे अपने I
जिनके काँपते हाथों ने मुझे दफनाया, नीम-अँधेरे,
उनका क्यों नहीं जकड़ा तूने सुबह-सवेरे ?
कबतक ख़ामोशी से सिर्फ दर्द सहती जाएगी ?
कभी दूं अग्निपरीक्षा, कभी बांधू आंखों पर पट्टी, यही सिखलाएगी ?
माँ, तू तो धरती है, ज़रा टिकने तो दे,
पिता, तू आसमान है, एक उड़ान भरने तो दे I
माँ मेरी मिट्टी है, पैरों से रौंदी जाएगी,
पिता, यह परंपरा तूने ही तो बनाई है I
दूर तना गर्व से जो तू बड़ा मुस्काता है,
सोचती हूँ, क्या कभी तुझको ये ख्याल आता है ?
बूंदे भी तू तभी बरसाता है,
मेरी माँ की तपन का जब परस पाता है I
माना कि तेज है, तू सूरज का,
और है चाँद की ठंडी छुअन,
ममता से धरती अगर जुल्म तेरे सारे सहती ना,
कहाँ छिटकती तेरी चांदनी ?
कहाँ बिखरती वो किरण ?
माँ की कोख की गर्मी से इस कब्र की सीलन तक,
एक रोज़ मेरी मिट्टी मांगेगी तुझसे अपना हक़,
यह मेरा जिस्म नहीं, रूह नहीं, बोया तूने एक सपना,
जिस दिन भी खिलेगा, गज़ब रंग लाएगा अपना I
By Varsha Rani

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