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-मर्म-

मृत्यु एक शाश्वत् सत्य है। जैसे जीवन एक शाश्वत सत्य है ।


एक जीवन ने असंख्य वेदनाएँ सहकर,

एक जीव को नया जीवन दिया,

क्या भर पाएगा तू ऐ जीव, उस जीवित जननी,

का वो ॠण, तेरी अस्मिता की परिणति नहीं है टलनी


उस जननी ने कुंठित समाज के ,

कठोर,असहनीय थपेड़े खाके,

अपने जीव को बड़े यत्न कर बड़ा किया,

अपना सब न्यौछावर करके

नाम,विद्या, सम्मान दिलाकर, उसे गौरवान्वित किया ,


बन प्रेरणा चली वो आगे जब,

थाम उंगली वो जीव, पीछे भागे तब,

सारी अपनी पूंजी लगाके, जननी ने था क्या पाया?

ना हंसी ठिठौली,ना सम्मान, ना आत्मीयता ,

ना अपनापन, ना ही सुंदर वो काया,


क्या भूल गया तू , ऐ मानव ,

उंगली पकड़ तेरी, तुझे, उसने चलना सिखाया,

ना केवल तुझे चलना सिखाया, वरन,

गिरने से तुझे थाम लिया,

पढ़ा - लिखा कर, उसने तुझे एक मानव बनाया,


बड़ा होकर क्यों, लगा है इतराने अपने ऊपर,

अपने धन,अपनी दौलत, अपने बच्चे, अपने घर पर ,

वही वृद्धा माँ, आज जब पड़ी मृत्यु शय्या पर,

निहार रही असीम शून्यता ,बूंदें अश्रु की लिये नयनों पर, अनंत यादें वो दिल में समाये , लगी विचारने नियति पर,


वो वेदना, वो सिहरन, वो ददॆ,जो जिंदगी ने दिये ,

निशब्द एकटक देख रहीं, अपने मन के बुझते दिये,

ऐ मानव! माँ की आखों से बह रहा, बन कहानी,

वो करुणामय संघर्ष व अवचेतन मन का झर- झर पानी,

सोच रही वो, भाग्य के अनगिनत ,अबूझ प्रश्नों की हानि,


क्या देखा कभी जो तूने, अपनी जननी का पावन मन,

नयनों में ,अश्रु धारा और पड़ा वो तृण,

ऐ मानव! मृगतृष्णा में बंधा , है तेरा ये अभिमानी मन,

तू उतार क्या पाएगा, उस ममतामयी , स्वाभिमानी माँ का अमूल्य , अतुलनीय वो ॠण,


वो अपनी ही मृत्यु का देख रही ये मंज़र,

धुंधली यादों की यात्रा में, विलुप्त होते अस्थि -पंजर , कौन मिटा सकता है ? उनकी अनकही विभतस्य वेदना का वो संघषॆ,

जिसने लुटा दिया जीवन तूझपर, खुशी-खुशी और सहषॆ


उनकी अंतिम घड़ियों में, क्या तू इतना कर पायेगा?

लौटा दे उनकी ममता का और सिर पर रखे वरदहस्त का वो मीठा प्रण,

अनमोल धरोहर है ये माँ , तू कभी ये ना समझ पाएगा ,

स्वगॆ से ऊँचा स्थान है उसका , पल में करे सुखमय क्षण


माता का ॠण चुका जो पाये, ऐसा कोई इंसान नहीं ,

ये घमंड, ये दंभ, ये अभिमान, ये अहंकार कहीं,

रह ना जाये पल भर में, ये सब कुछ यहीं का यहीं

ऊँचीं दीवारें, ऊँचे सपने, तेरे बच्चे, तेरा संसार ,

तेरे अपनों के बीच ही, तेरा कोई स्थान नहीं,


हो जायेगा पतन तेरे आचरण का, क्षणभंगुर में यहीं,

काल जो निर्णय करेगा जब, होगा मिलन अही का यहीं,

डोल जायेगी ये धरती तब ,और डोलेगा ये गगन,

तांडव जो किया सृष्टि ने, काँप उठेंगे हृदय और तन,

होगा प्रलय व डह जायेंगे अविलंब ये तेरे दुर्ग और भवन,


By Rekha Lall















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