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पिता

By Priyank Yadav


कर दूं समर्पित तुझको भी

सोच रहा हूँ इक कविता।

बच्चो के लिए खुद को भुला

दुनिया कहती उसको है पिता।

उसके श्रम के आकाश से ही

है धरती पर मेरा भी पता।

है गाते माँ का प्यार सभी

पर भूल जाये हर कोई पिता।

कर दूं समर्पित तुझको भी

सोच रहा हूँ इक कविता।

बच्चो को शिक्षा देने को

श्रम करता है दिन रात पिता।




परिवार के पालन पोषण में

सेहत खुद की भूला वो पिता।

माँ होती पहली अध्यापक

पर विद्या का आलय है वो पिता।

कर दूं समर्पित तुझको भी

सोच रहा हूँ इक कविता।

घर मे बरकत माँ से है तो

उसकी पीछे की महिमा है पिता।

संस्कार अगर देती है माँ

तो वेदों का वर्णन है वो पिता।

हो जाती धरती जहाँ खत्म

सागर में राम सेतु है वो पिता।

अब हुआ सफल लेखन मेरा

जब लिखा तुम्हारे लिए पिता।

कर दूं समर्पित तुझको भी

सोच रहा हूँ इक कविता।


By Priyank Yadav





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