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नज़र

By Prasanna Jha




हां, लगती है नज़र


जब वो नक़ाब पोश आंखें देखती हैं झूठी मुस्कान से

उस निर्मल ओस कण को तब लगती है नज़र,


कोख में अंकुरित बीज के लिंग पर गड़ी वो कंस निगाहें

जब ठहाके लगाती हैं मन में, तब लगती है नज़र,


मां के लगाए काजल के टीके को जब सुनने पड़ते हैं ताने नश्तर से

"इस काली को टीके से क्या लेना" तब, हां तब लगती है नज़र,


चंद्रमा से अपूर्व सौंदर्य को निर्माल्य सा विसर्जित करें

उस ग्रहण ग्रसित अमृत से भी लग जाती है नज़र,


केश में लगे मोगरे की सुगंध जब उन्मादित करती पशु मन

द्रौपदी सा निर्वस्त्र होता विवेक तब,लगती है नज़र


आशाओं का परिंदा जब फैलाता अपने उन्मुक्त पर

तो क्षुधातुर उस गिद्ध दृष्टि से लगती है नज़र,


काश कोई खेत हो ऐसा यहां जिसमे उपजे ऐसी नींबू मिर्च,

जिसकी खटास से फूटें वो नज़रें और रंगों से संवर जाए ये जहां।


By Prasanna Jha





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