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तलाश

Updated: Sep 20

By Susheel Chauhan

है ना?

भीतर की जंग कैसे लड़ता है आदमी,

अपनापन ही फिर अपने से कहीं

खो बैठता है आदमी।

फिरे आवारा सा, चाहे यूं तो आदमी।

अपना ही निशा मिटाता,

खुद को खोजता आदमी।।


असफलताओं से सफलताओं की जंग में,

हर कदम पर अपने ही वजूद से हारता आदमी।





मानता है हर रोज़ कि

इक रोज़ मरना ही होगा,

फिर भी यहां,

हार खुद से नहीं मानता आदमी।


यही तो कश्मकश है,

वजूद की तलाश में,

खुद को भूलता, भुलाता आदमी।।


दुनिया भी देखी......

खुद सी, तुझ सी।

नकाब भी देखा.....

आइना भी देखा,

मूझ सा, तुझ सा।


फिर भी खुदका सही वजूद,

अपने मरते दम तक,

कहां खोज पाया आदमी।

कहां खोज पाया आदमी।।


By Susheel Chauhan




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