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जैसे

By Jaideep Muthiyan


हुनहर तो हर किसी का अपना होता है

फ़िर क्यों बन जाते है हम एक जैसे


तरीक़े तो अलग़ अलग़ हो सकते है

फ़िर क्यों सूझती है तरकीबें एक ही जैसी

बचपन तो दिशाहीन हुल्लड़ मचाने का दौर होना चाहिए




फ़िर क्यों समाज की मशीनरी में पीसते है हम उन जैसे

दुनिया तो बिना किसी ओर या छोर.... गोल है

फ़िर क्यों तकदीरोंके फ़ैसले होते है चौकोरों जैसे

नज़रिया तो देखनेवाला ख़ुद रखता है

फ़िर क्यों सवालों के ज़वाब होते है एक जैसे

कुछ डरकर, कुछ कुतूहलसे बगावत छिड़ती है

फ़िर क्यों मार खाकर है हम कुछ दबे जैसे


By Jaideep Muthiyan




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