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गलती

By Y. Deepika


पता नहीं आखों से आसूं क्यों बह रहे है।

सोचा तो याद आया कि, तुम्हारी सीरत छोड़, सूरत देख के प्यार करने कि गलती जो की है।

पता नहीं क्यों पैर आगे ही नहीं बढ़ पा रहे है।

सोचा तो याद आया कि तुम्हारे कदम से कदम मिलाकर चलने कि गलती जो की है।

पता नहीं क्यों हाथों से सब कुछ फिसलता जा रहा है।

सोचा तो याद आया कि इन्ही हाथों ने तुमसे तोहफे लेने कि गलती जो की है।

पता नहीं क्यों ख्वाब टूटते जा रहे है।




सोचा तो याद आया कि हर ख्वाब तुमसे जुड़ने कि गलती जो की है।

पता नहीं क्यों बाल कटवाने का मन कर रहा है।

सोचा तो याद आया कि तुम्हारी उँगलियों से उलझने कि गलती जो की है।

पता नहीं क्यों ये कागज़ फाड़ने का मन कर रहा है।

सोचा तो याद आया कि इनपे तुम्हे प्यार कि चिट्ठियां लिखने कि गलती जो की है।

पता नहीं क्यों ये दिल टूट रहा है।

सोचा तो याद आया कि इस दिल ने तुम्हारे दिल से जुड़ने कि कोशिश जो की है।


By Y. Deepika





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