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आइना

By Prasanna Jha






एक आइना बेदाग सा, बेबाक सा उन्मुक्त सा,

सच्चाई सारी खोलता, बेबाक मुंह पर बोलता,

जिसको न था डर ताज का, था जो बुलन्द आवाज़ का,

राहों के शूलों से लड़ा, कभी तप्त धरती पर चला,

पर हार मानी ना कभी, सच ही कहा,सच ही कहा,

हाय, वक्त ने करवट जो ली, तो आईने पर रज जमी,

सीखा फिर उसने तोलना, मुंह देख कर के बोलना,

बातों का घेवर ले बना, भ्रम की मलाई से सजा,

है परोसता ये इस क़दर, कि सच भटकता दर-ब-दर,

आरोप- प्रत्यारोप का, कितना घिनौना है ग़दर,

ऐ काश की ये आइना, फिर साफ़ हो जाए ज़रा,

और सत्य फिर से मुदित हो, हो तम रहित पूरी धरा ।


By Prasanna Jha




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