ज़रुरत
- Hashtag Kalakar
- Dec 12, 2025
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By Varsha Rani
जब सांस ज़हर बन जाती है, सीने में कहर जगाती है,
जब रेशा-रेशा बिखरता है और रेज़ा-रेज़ा ढहता है I
जब ज़ीस्त की सूनी राहें हों, हमसाया अपनी आहें हों,
जब मंज़िल नहीं दिखाई दे, जो सहारा दे, वो ना बाहें हों I
तेरी इतनी सुंदर दुनिया में खुशियों के कुछ ही वसंत जिए,
फिर काली सी इस बरखा के खारे-खारे आंसू ही पिए I
मिट्टी के खेल-खिलौने हम, तू गढ़ता है, फिर तोड़ता है,
ना जाने किन अपराधों के भरपूर सज़ा हमें देता है I
तेरी रहमत ने जब मिट्टी से मेरा जिस्म गढ़ा और जान भरी,
सब कहते हैं मेरी माँ की दुआ, वह तूने ही तो कबूल करी I
मेरी खुशियों के लिए दामन फैला, वह आज भी सज़दा करती है,
दम घोंटने वाली एक सिसकी मेरे बाप के रूह को गलाती है I
इस पर भी आलम यह है की तुझको ही खुदा मैंने माना है,
मेरा जज़्बा देख, मुझे हिम्मत दे, तुझे बंदा-परवर जाना है I
अपनी मर्ज़ी का मालिक तू, तेरा अहम् ही मेरी किस्मत है,
मेरा जीवन है एक खुली किताब, मेरे पाप-पुण्य की फ़ेहरिस्त है I
सब कहते हैं तेरी मर्ज़ी है, मेरी हार पे तू भी राज़ी है ?
तू राज़ी है और क़ाज़ी है, फिर तुझसे लगी यह बाज़ी है I
नहीं हार नहीं मैं मानूंगी, नहीं गिला कोई कर जाऊंगी,
रंग लाए मेरी माँ की दुआ, बस यही विनती दुहराऊंगी I
मैं भी तो आखिर अक्स तेरा, तुझसे बढ़कर मेरा अपना कौन ?
मेरी हार पर जो तू बैठा मौन, फिर तुझको खुदा कहेगा कौन ?
गर मुझको तेरी ज़रूरत है, तो तुझको भी मेरी ज़रूरत है I
By Varsha Rani

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