हे सखी
- Hashtag Kalakar
- Nov 30
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By Sangeeta Singh
हे सखी,
होठों में अद्भुत खामोशी,
नेत्रों में रक्त-अश्क धारा।
अस्थि स्वरूप सी युवा में
प्रौढ़ा प्रतीत।
तुम उपहार और श्रृंगार,
दुर्गा-लक्ष्मी का अवतार।
तेरा स्वरूप अबला नहीं,
तुम तो हो सृजनकार।
पथ में है कंटक-जाल,
आत्म-वेदना से नहीं,
आत्म-चेतना से बढ़कर
जाना है मंजिल पार।
हे सखी,
ध्वनि-जागरण की गुंजित हो रही
तुम अबला नहीं,
सबला हो।
By Sangeeta Singh

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