हृदय वासनी
By Kumar Priyanshu
तुम वास हृदय में करती हो,
तुम मन चेतन में रहती हो,
हां कौन घड़ी तुम याद नहीं,
हर समय स्मरण में रहती हो।
तुम आलोक सुबह की रवि हो,
तुम चंद्र छांव की छवि हो,
तुम सांझ सवेरे पहर दोपहर,
तुम बारह मास हर घड़ी हो।
तुम जड़ चेतन की चेतना,
तुम हृदय पीड़ा की वेदना
तुम जीवन की अमृता,
तुम मृत्यु को कहती देखना।
तुम अमरत्व बहा कर लाई हो,
सिर्फ तुम्ही हृदय को भाही हो।
तुम वास हृदय में करती हो,
तुम मन चेतन में रहती हो,
हां कौन घड़ी तुम याद नहीं,
हर समय स्मरण में रहती हो।
तुम जीवन की प्रीत हो,
तुम नैनो की नींद हो
तुम अवसर उस जीवन की
जहां प्रेम सदैव स्थिर हो।
तुम कैलाश शिखर की मानसरोवर
तुम देवप्रयाग अलखनंदा हो
तुम शिव की जटा से बहती
अमृत धारणी गंगा हो।
सागर से गहरे भाव तुम्हारे,
वृक्षों से सीतल छांव तुम्हारे
घनघोर अंधेरे रातों में भी
पूर्ण चंद्र से ताव तुम्हारे।
आकशमार्ग से आई तुम
ऐश्वर्य रूप की रंभा हो
धरती पर बैठ इस मनुष्य की
जीवन दाहिनी गंगा हो.
तुम पुष्पों की रंग हो, कलिया और सुगंध हो
तुम वीणा की धुन की, ऊर्जा और उमंग हो
शिव के डमरू के ढोल की, नट नृत्य के संग हो
तुम आरंभ ध्वनि की वो राग,
जिसने आरंभ किया ये जग हो।
तुम ही सर्वत्र, हर ओर खरी
तुम ही, तुम ही, सिर्फ तुम ही
इस मन के वन में छाई हो
सिर्फ तुम्ही हृदय को भाही हो,
सिर्फ तुम्ही हृदय को भाही हो।
तुम वास हृदय में करती हो,
तुम मन चेतन में रहती हो,
हां कौन घड़ी तुम याद नहीं,
हर समय स्मरण में रहती हो
हर समय स्मरण में रहती हो।
By Kumar Priyanshu

Tremendous
Wow such a beautiful lines.
Bahut achaa Hai Bhai. Keep it up. Or kuch publish Karo yar. Achaa hai
``आपकी भावनाएं शब्दों में उतर आईं। बहुत अच्छा।``
Beautiful poem bhai