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हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!

Updated: Sep 21

By Vishal chaudhary


क्यूँ औरत पैदा होती है, हम हैवानों की बसती में

है इज़्ज़त का कोई दाम कहीं ? नीलाम हती सस्ती में

ग़र कहते हैं हम झूठ है ये, फिर किस दुनिया में रहते हैं

हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!

आँखों से जिस्म को खाते हैं, वहशी से नज़र यूँ आते हैं

आतुर से हवस मिटाने को, रूह तक नंगी कर जाते हैं

इक दो रावण तो ठीक थे, अब हर ज़ेहन में शैतान रहते हैं

हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!

शामें उनकी ख़राब कर, महफ़िलें अपनी सजवाते हो

बुर्का-हिजाब, पल्लू-परदा, ढोंग हज़ारों करवाते हो

खुद को भी कुछ नियम बनाते, कोड़ियों में ईमान जो ढहते हैं

हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!




हरमों को अपने सजा दिया, दिल का पूछा क्या हाल ज़रा ?

कभी तो ज़िंदा जला दिया, फिर पकड़े बाल और दिया डरा

मान लिया गुनहगार नही हम, पर चुप तो हम भी रहते हैं

हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!

माँ बेटी बहन बहु पत्नी, सबकी इज़्ज़त तो यहाँ बिकती है

बेग़ैरत से हैं लोग यहाँ, जाने कहाँ किसकी नज़र टिकती है

घावों से कहाँ उनसे पूछो, जिनकी आँखों से लहु भी बहते हैं

हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!

कोख़ों को कुछ दाम दिया, छाती को भी सरेआम किया

इस ख़रीद-फ़रोख़्त में तुमने, अपनों को भी नीलाम किया

कुछ लफ़्ज़ों में कैसे लिख दूँ, ज़ुल्मो-सितम जो बीते हैं

हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!


कहने को वैसे देश तो ये, देवी - माता की भूमि है

गाँव-शहर जाकर देखो, दुनिया पितृसत्ता में झूमी है

कुछ सीख ही लेते सीख कहीं, जयकारे में जो रटते हैं

हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!

कब कहाँ से करें शुरू, है क़िस्सा कितना नया-पुराना

उम्रें बीती सहते सहते, ज़माने के ज़ुल्मों का नज़राना

‘माधव’ नही ‘द्रौपदियाँ’ सभी, है ‘समय’ सुना यूँ कहते हैं

हम किस लहजे से भारत को, ये माता-माता कहते हैं !!


By Vishal chaudhary






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