स्नान
- Hashtag Kalakar
- Nov 28
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By Dhruwa Shankar Prasad
आज कुछ अजब हो गया
नहाते नहाते गजब हो गया
एक साबुन शहीद हो गया
दूसरे साबुन में सबलता का अभाव था
कुछ शीघ्रता का प्रभाव था
बेचारा साबुन कहीं गुम हो गया
"बउआ की मम्मी , सुनती हो !
एक नया साबुन दे दो"
आवाज आई --
"समझा समझा कर थक गई
साबुन एक जगह क्यों आप रखते नहीं ?
छोटी सी बात क्यों बाप बेटा समझते नहीं ?"
"मम्मी, पापा का ट्रांसफर कम होता है
पर चिकने साबुन का ट्रांसफर क्या कोई रोक सकता है?"
"चुप शैतान, पापा का वकील बनता है !
दोनों को जब समय पर साबुन नहीं मिलेगा
तब पता चलेगा
आटे के परथन से लोई बना लेती हूं
अचानक फटे दूध से रसगुल्ला बना लेती हूं
बची मलाई से घी बना लेती हूं
शादी के कार्ड से धनुर्धर का तरकश बना लेती हूं
बाप बेटे को कुछ आता नहीं है
साबुन का टुकड़ा तक संभलता नहीं है"
"सपने तेरे ,आंखों में लिए हैं मैने
खामोशी को पढ़ा है मैने
अनकहा को सुना है मैंने ....."
"बस बस बस कवि महोदय
मुझे लंच बनाना है
लंच पैक करना है
बउआ को तैयार करना है
उसे स्कूल भेजना है
इसीलिए इस कविता को यहीं रहने दीजिए
मुझे किचन में प्रस्थान करने दीजिए
ये नया साबुन आप ले लीजिए
अल्पविराम के बाद ,मंगल कामनाओं के साथ
पुनः स्नान आरंभ कर दीजिए।"
By Dhruwa Shankar Prasad

Great! Keep Growing!🙌🏻👍🏻
Very funny poem😅
जीवंत कविता