वक़्त
- Hashtag Kalakar
- Oct 4, 2025
- 1 min read
By Akanksha Singh
फिसल गया रेत-सा
पलट गया नसीब-सा
साथ चला कुछ कदम
उजड़ गया चमन सा
कहा मैंने कि वापस आ
वो गुज़र गया भंवर-सा
समझ आया देर से
धुँआ था सो उठ गया
ख़ुमार था जो चला गया
मैं मान लू तुझको
कुछ भी अब सोच के
तू मेरा न था
चला गया जो कोस के
छोड़ कतरे आँख पे ओस के
था जो हम में
कल-कल की बात है थी
आज सवेरा साथ है
कल अँधेरी रात थी
मिट गया सब नक्श से
हट गया सब अक्स से
जाए अब तू जहाँ भी
रहे बस वहाँ ही
आएँ न अब लौट के
गये थे जो छोड़ के
ख़्वाब थे वो मोम के
पिघल गये जो आँच से
By Akanksha Singh

Absolutely best...
Beautiful ❤️❤️
This poem speaks from the heart
Beautifully written
Definitely great...