रत्नप्रभा
- Hashtag Kalakar
- Nov 24
- 1 min read
By Jeetisha Dutt
समय का चक्र तेज़ दौड़ता है।
भ्रमित करता है, पर जी यहीं चाए,
कि हँसते मुस्कुराते प्रकृति के गोद में,
अपने धुन में गुम हो जाए।
इस मोह-माया के विकराल जंजाल में,
विद्वान सुजन है असल हीरे के ग्राही।
उस परं शांती के ही तलाश में,
घूमते हैं मार्ग भटके राही।
जब श्वेत शशि की रजत रौशनी,
पड़े वृक्षों के हरे-हरे तन पे,
तब दिल की धड़कन चाहती है कि,
खो जाए सपनों के वन में।
उस स्वप्नलोक में द्वेष कहाँ है?
केवल स्निग्ध सुरों के प्रफुल्लित मिलन
आत्मा- परमात्मा के संगम का राह है,
धरित्री का यह अनमोल रतन ।
By Jeetisha Dutt

Divya anubhuti
Beautiful lines
एक कक्षा १० की छात्रा द्वारा रचित एक अद्भुत कविता , शब्द की चयन और भावना की इतनी स्पष्ट अभिव्यक्ति का यह प्रयास बहुत सराहनीय हैं