मैं हूँ ना घर तुम्हारे लिए
- Hashtag Kalakar
- Dec 15, 2025
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By Jyotsna Kalkal
जब फ़ुरसत ना हो काम से
ऊब ही जाओ दुनिया तमाम से
जीत कोई जतानी हो
ख़बर नई सुनानी हो
बात रोज़ की या राज की
परसों, कल या आज की
दिल चाहे बेतकल्लुफ़ होना
अपनी मर्ज़ी चलाना
तुम बस घर लौट आना
कुछ वहम , कुछ धुँधला दिखाई दे
रह रह कर काश़ सुनाई दे
जवाब से ज़्यादा सवाल हों
ख़ुद के ही ख़िलाफ़ ख़याल हों
वक़्त को वापस मोड़ना चाहो
सब कुछ पीछे छोड़ना चाहो
पर मुश्किल लगे छोड़ पाना
तुम बस घर लौट आना
डाँट फटकार अच्छी लगे
शुद्ध देसी बातें सच्ची लगें
बाहर भीतर एक से होना चाहो
अपना बस एक कोना चाहो
याद आए बार बार
माँ के हाथ का खाना
तुम बस घर लौट आना
जब यक़ीन छूटने लगे
कोशिश लाख किए
ख़ुद से ख़ुद तक का सफ़र
तय करना मुश्किल लगे
महसूस करना उस वक्त
नज़र घुमाना जरा
कोई कहेगा बाहें फैलाए
लम्हों को आसान किए
मैं हूँ ना घर तुम्हारे लिए
By Jyotsna Kalkal

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