माँ : रब से भी बढ़कर
- Hashtag Kalakar
- Dec 16, 2025
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By Vikash Kushwah
मैं माँ को रब का ओहदा नहीं दे सकता,
क्योंकि रब सोचता है… माँ तो कर जाती है।
ख़ुदा से पहले सौ सजदे, सौ सवाल होते हैं,
माँ एक आह भी सुने… तो जान दे जाती है।
ख़ुदा तक आवाज़ देर से पहुँचती होगी शायद,
माँ तो धड़कनों से पहले सुन ले जाती है।
जहाँ मिन्नतों की ज़ुबां चाहिए रब के लिए,
वहीं माँ नज़र से ही सब समझ जाती है।
वो माँ जो कभी थामे थी मुझे गिरने से पहले,
आज भी मेरी राहों में दुआ के फ़ूल रख जाती है।
‘विकाश’ कहे, क्या खुदा से तुलना करूँ मैं उसकी,
जो मेरे हर ग़म में ख़ुद जल के रौशनी दे जाती है।
By Vikash Kushwah

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