प्रेम हरे राम (भक्त से प्रभु के पद चरणो तक):
- Hashtag Kalakar
- Nov 26
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By Shreeyash Bahuguna
क्या ठहारा इंसान मैं जब केवल अपनी सोची ;
दूजे को ना समझ कभी, ना समझी कोई रुचि;
यह जीना भी जीना हुआ, जिसमें सबको खोया ;
करुणा मय मन पाकर भी, ना दूजो के लिए रोया;
न समझि उदारता भव सागर की, जो शून्य सबमें विराट गूंजे;
क्यू सोया रहा आँखे मूंदे?
देर सही किंन्तू खुली है अब ,समझ आता संसार का सत्यमौन में विलीन सब , अब भवसागर में मैंने अपना राम रमाया
जीत विजय कर क्या ही पाया, खोया हारा क्या गवाया ,
मन को अब निर्वाण मिली देह बुद्धत्व में विस्मय हो चली
क्या ठहरा इन्सान मैं अब केवल करूणा का पात्र बचा;
सत्य, सुख-दुख, राग-द्वेष ना ;ना झूठा अहंकार बचा;
ना बचा जगत मैं - मेरा, सब जगत को दें चला;
यह देह मेरी जब राख बने, मोह सपने सब ख़ाक हुए;
प्रिय श्रेष्ठ एक मृत्यु बचीं, जो जीवन की ख़ास सखी;
जो भवसागर के पार लगा मैं, भक्ति मौन में बहा चला,
क्या ठहरा इन्सान भला अब ईश्वर के कमल चरणो की रज बचा।
By Shreeyash Bahuguna

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