पूर्ण विराम।
- Hashtag Kalakar
- Nov 30
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By Bhumika Haritwal
मैंने आज एक स्वप्न देखा,
जिसमें चाँद - तारों का ठिकाना था,
लूभित होकर, वहाँ तक पहुँचने को मैं जुट पड़ी,
कई जतन, प्रयास, मेहनत,
वहाँ पहुँचने के संघर्ष को पूर्ण विराम देने में।
अंततः जब पहुँची उस सपनों के शिखर पर,
थकी हुई साँस में राहत भर ली।
पर तभी विस्मय ने पुकारा-
"यह ब्रह्मांड तो आरंभ है, अंत नही"
तारों के पार फैला एक और स्वप्न,
जो मेरे भीतर आकार लेने लगा,
मैं समझी, यह यात्रा अपूर्ण नहीं,
यह तो बस शुरुआत हैं।
तब से मैंने
जीवन के संघर्षो के आगे
पूर्ण विराम लगाना छोड़ दिया।
By Bhumika Haritwal

One of the best poem I have ever read literally goosebumps and very amazing poem.