नज़रियाँ
- Hashtag Kalakar
- Nov 28
- 1 min read
By Rajneesh Khohiya
नंगे बदन पर,
ख्वाहिशों के कपड़े
जो दिए थे किसी ने,
वो उतारे हुए कपड़े।
पहनकर उन्हें,
उसमें जान आ गयी,
जैसे नन्हे परिंदे को
पहली उड़ान भा गयी।
चिल्ला कर अब
मोहल्ले को वो जगा रहा है,
दीवाली पर मिले नसीब से
नए तोहफ़े वो, सबको दिखा रहा है।
बन जाएगा नवाब,
वो पहनकर उन्हें,
इतराएगा, मुस्कुराएगा,
धुलाकर उन्हें।
कुछ दूर उस बच्चे की माँ है खड़ी,
होंठों पर मुस्कान,
पर आँखें भिगोए है खड़ी
माथे पर बेबसी की शिकन है पड़ी।
स्वाभिमान की ठेस
ये सब स्वीकार नहीं करती,
पर बच्चे की हँसी देख,
वो इन सबसे इंकार नहीं करती।
आत्मसम्मान को लगी कमबख़्त,
प्यार की मार,
माँ के आगे मान ली
उस औरत ने हार।
अब खैर, जो भी हो
गरीब का घर नहीं होता
खुशियों का ठिकाना,
जितने पल मिले खुशी के
उन्हें दिल से निभाना।
जो भी मलाल है,
त्योहार के बाद ही मनाना।
उसे हँसते देख
वो "अहा" भरती,
अब “अहा” न भरती
तो बेचारी और क्या करती।
साँसों से अपनी
वो दुआएँ करती,
ऊपरवाले के फ़रिश्ते को
याद है करती।
वहीं दूजी तरफ़
एक नवाब की औलाद है,
दुकान खरीदकर भी
मन में सवाल है
“इस बार तो कुछ लिया ही नहीं,
ये दीवाली कैसी आयी?
इस बार कुछ किया ही नहीं...”
पर यही तो है फ़र्क,
अपना-अपना नज़रिया,
अपनी-अपनी समझ
क्या सही, क्या ग़लत,
ये तो हालातों की बात है।
कोई भीड़ में भी तन्हा,
कोई अकेला ही रज़ी,
ये तो अपना-अपना नज़रिया है,
अपनी है समझ
क्या सही, क्या ग़लत,
हर किसी की अपनी है समझ।
By Rajneesh Khohiya

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