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धरती के संकेत

Updated: Dec 21, 2023

By Geetanjali Mehra


जाने कितनी सदियों से धरती करती आई सचेत

मानव ने टाल दिये उसके सभी संकेतI


प्रकृति ने सूझने बूझने की कशमता

मुझको ही दे डाली

ईसी अहंकार में उसने पृथ्वी सिर्फ अपना नाम लिखवा ली  I


इतने वर्षों में माँ बन कर धरती ने पुचकारा

बालक की हर नादानी को अन्देखI  कर सब सम्भा ला I


बार-बार मौका दिया बदलने का

गिर-गिर कर फिर से संभलने का I


बच्चों को सही दिशा मां ही दिखाएगी

गिरने लगे अगर तो बचाने दौड़ी चली आएगी I




सज़ा दे कर सीखIना माँ का ही फ़र्ज़ है

हर संतान को चुकाना होगा जन्म का ये कर्ज़ है I


धरती को बर्बाद करके हो गए सब भ्रष्ट

इसका परिणIम केवल करेगा मानवता को नष्ट I


बढ़ता धुआं सभी प्रकार से बढ़I रहा तIपमान

अंगणीत  इच्छाएं, वस्तुएं और बढ़ता हुआ सामान I


सागर में ये लाएगा ऐसी सुनामी,

पानी के इस वेग को नहीं रोक पाएगा प्राणी I


अभी भी समय है के इन संकेत को समझ जाएं हम

इस से पहले की हो जाये सब कुछ ख़तम 

सब कुछ ख़तम 

सब कुछ ख़तम II


By Geetanjali Mehra







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Geetanjali Mehra
Geetanjali Mehra
Jan 13
Rated 5 out of 5 stars.

Amazing poem 👏

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Geetanjali Mehra
Geetanjali Mehra
Jan 13
Rated 5 out of 5 stars.

Beautiful poem

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Shikha
Shikha
Jan 12
Rated 5 out of 5 stars.

Every single line is beautifully written

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Anjali Deshpande
Anjali Deshpande
Jan 11
Rated 5 out of 5 stars.

Nice Poem

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Reena Arora
Reena Arora
Jan 10
Rated 5 out of 5 stars.

Beautiful article voicing the dangers of over exploitation of mother earth.

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