जीवन हास्य कला है
- Hashtag Kalakar
- Nov 26
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By Shreeyash Bahuguna
जीवन तो एक हास्य कला है, यहाँ रोने का मूल नहीं।
रो-रो कर जो इसे गवाए, , उस मूर्ख का मोल नहीं।
घाव गवाकर भीड़ जुटाए, खुद तो रोये, दूजा रुलाए।
अब दो मूर्ख,
एक दूजे के घाव दिखाकर, , एक दूजे का मोल लगाए।
देख संत, खूब हसत कहत मूर्ख को कौन समझाए।
कहते संत, सुनः दुख गामी,
जीवन में जो तू बांटे वही लौट कर दुगना आए।
दुख बांटे, दुगना तू रोये, , सुख बांटे तो सुख्त हो जाए।
जो सत्य का नाम है बांटे, आनंदित होकर मुक्त हो जाए।
सुनत प्रिय साधक, मोहे वाणी, पीले तू यह सुख वाणी।
जीवन में सब तेरा रचित, फिर काहे तू रोये पछताए।
जीवन तो है खेल की भांति, नाच, , खेल इस तरंग संग सब लुटाए;
लगावत गोते जो इसमें, , तो घृणा द्वेष कहा से आए।
जीवन के इस हास्य मंच में, मरघट पर भी नाच नचाए;
उस चेतन्य को पीकर तो देख, नाचे गाए, शोर मचाए;
माया जो है, रमी रमाई, पल भर में वो भस्म हो जाए।
राम रमा कर, शिव समाए, नहीं मानते तो छोड छोड़ ये पाखंड।
हास्य-हर्ष का जाप जपाए,
यह धरती तो थी ही मरघट, फिर किसका तू शोक मनाए।
फिर इतना सोचे क्यों साधक, फूंक चिलम पी मदिरा क्या होगा, पछे पछताए।
फिरत नग्न मन, पावन धरा पर,
कर जो करना, किंतु करना पूर्ण।
शीश झुका सबको नमन कर, करुणा पूर्ण,
नाच नचा, धुनी रमा, खोल हृदय और जो भी कुछ है सब लुटा।
यह धरती तो खेला है, यहाँ क्या ही खो लेगा,
जीवन तो एक हास्य कला है, यहाँ यहा कितना ही रो लेगा।
By Shreeyash Bahuguna

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