जीवनदायिनी नदी- स्त्री
- Hashtag Kalakar
- Aug 4, 2025
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Updated: Aug 22, 2025
By Mukta Sharma Tripathi
पुत्री रूप में हृदय पट खोले।
जब भी बोले, बस मिश्री घोले।
ज्यों ही कलि मन, वन महकाए,
अंकुरी बन, बगिया में डोले।।
धात्री, गायत्री अंजुरी खोले।
मृदुल पवित्रता, आँगन में घोले।
अके-थके बिन सब सहते-बहते,
रक्तिम, अरुण सी, नस-नस में डोले।।
सहोदरी, सखी प्रगति पथ खोले।
मन भ्रमरी सी मृदु, गुंजन घोले।
दु:ख, कष्ट का दंश, नष्ट-भ्रष्ट कर,
चंचल-चंचल चिड़िया सी डोले।।
अर्धांगिनी तो, अमृत घट खोले।
कामलता, हृदय सरसता घोले।
सुंदरी-मंजरी, मन-नेत्री बन,
सावित्री सम्मुख, यमपुरी डोले।
बाल सूर्य-चंद्र, नैना में चमके।
सम्पूर्ण अंतरिक्ष, हृदय में दमके।
हर रूप में स्त्री है, अनुपम, उत्तम,
जीवनदायिनी नदी आई, बनके।।
By Mukta Sharma Tripathi

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