जिंदगी
- Hashtag Kalakar
- Aug 11, 2025
- 2 min read
By Vijay Kumar Nagar
जिंदगी की राह काफ़ी मुश्किल और तवील है.
काँटों भरे इसके हर मोड़ पर. हिम्मत टूट जाती है.
उठते है तूफान अचानक. इस समंदर में ऐसे.
कामयाब कई किश्ती. साहिल पर डूब जाती है.
आती है सदा दिल से. जीने की चाहत की
जब मैं मरना नहीं चाहता. तब मौत आती है.
किस तरह कोई जिए. इस ज़माने में तन्हा
तलाश दामन की करता हूँ. बेरुखी हाथ आती है.
जिंदगी सब की बे मक़सद चलती है
तलाश ए सुकून में उम्र सब की कटती है.
कोई तो बहाना है पास सब के. सच्चा झूठा जीने का
बहाना मिल जाए गर कोई. क़िस्मत मेरी रूठ जाती है.
बनी पहेली ज़िन्दगी ऐसी कि सुलझाई नहीं जाती
बचाते हुए दामन गमों से. राहे हयात उलझती जाती है.
कोशिशें हुई नाकाम. पेचों खम सुलझते नहीं हैं
तलाश ए क़रार में जिंदगी. ग़म के समंदर में डूब जाती हैं.
आती है नज़र हमें फिर भी. हसीन ख्वाब जिंदगी
रंगीन वादों के तसव्वुर में उम्र. सरकती जाती है.
हिसाब करने लगते हैं जी में हम. कभी तनहाई में
अफसोस करने की फ़ेहरिस्त लंबी होती जाती है.
बनाना चाहा जब कोई. आशियाना मर मरी बांहों में
जमीन कुर्क कर ली रब ने. अपील खारिज होती है.
जिंदगी मजबूर करती रही. मुझे मुसलसल चलने को
चिलचिलाती धूप से तपती राहें. तवील होती जाती हैं.
गमों के तूफान भी कहाँ पीछे हैं. साथ मेरे चलने में
आशियाना बनाने से पहले. शाखें दरख़्त की टूटती जाती हैं.
गुम ना हो जाऊँ सहारा में. चाँद सितारों को देख चलता हूँ
चाल बाज़ राहें हर क़दम पर. सब्ज बाग़ मुझे दिखाती हैं.
तक़दीर छोडती कैसे. कोई मौका मुझे बर्बाद करने का
लुटता रहा सरे राह अपनों से. खिलाफत मात खाती है.
खौफ था हावी शिकस्त ए दिल में. नाकामी का
दोबारा कोशिश करूँ कैसे. हिम्मत ख़ौफ़ खाती है.
लौट कर ना आ जाऊँ कहीं वापस. डर कर अँधेरों से
तसल्ली झूठी देती फ़ौज वफ़ादारों की. साथ-साथ चलती हैं.
किसने निभाई प्रीत कौन छोड़ गया साथ. हिसाब नहीं
यादें नाकाम रिश्तों की बे हया हो कर. साथ-साथ चलती हैं.
मुद्दत हुई हैं चुकाए अपनो का. वफाओं का उधार
बही ले कर वसूलने उधार. सनम साथ-साथ चलती हैं.
गबन किया था जिसने. मेरी मुहब्बत की जायदाद में
बरी होकर धोखे बाज़ के तोहमत से. सरेआम अकड़ कर चलती हैं.
रूठ कर ना जाओ जुदा होकर. लौट कर पास मेरे आ जाओ
चले थे साथ जहाँ से वही आओ. वापस साथ-साथ चलते हैं.
By Vijay Kumar Nagar

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