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- Hashtag Kalakar
- Nov 29
- 1 min read
By Khushbu Vandawat
ऐ मेरे मन, मैं पढ़ना चाहती हूं
मेरे सपनों को पंख दे पाओगे तुम?
खुले आसमान में उड़ना चाहती हूं
ऐ मेरे मन, मुझे खुला आसमान दे पाओगे तुम?
तिरंगे की तरह लहराना चाहती हूं
ऐ मेरे मन, क्या हवा बन पाओगे तुम?
मैं खुलकर मुस्कुराना चाहती हूं
ऐ मेरे मन, मेरा डर मिटा पाओगे तुम?
मैं अपने लिए लड़ना चाहती हूं
ऐ मेरे मन, मुझे हिम्मत दे पाओगे तुम?
ऐ मेरे मन, तू क्यों इस दुनिया की बातों में आता है
क्या मेरे लिए, ऐ मेरे मन, आज़ाद पंछी बन पाओगे तुम?
कुछ सवाल हैं मुझसे, ऐ मेरे मन
क्या इनका जवाब खुद को दे पाओगे तुम?
ये आवाज़ है तुम्हारी, ऐ मेरे मन
अपनी आवाज़ खुद सुन पाओगे तुम?
By Khushbu Vandawat

Well done khushboo
Nice
Very good and meaning full poem. LOVED IT!!!
nice poem
Nice and its really very motivating for comeback