खोयी हुई इंसानियत!
- Hashtag Kalakar
- Aug 18, 2025
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By Sonu Khan
हर कोई आतंकी नहीं होता,
कोई मज़हब नफ़रत नहीं बोता।
कई मासूम बस जीना चाहते हैं,
पर गोलियों से जवाब पाते हैं।
बच्चा था, खिलौनों में खेलता,
अब मलबे में माँ को ढूंढ़ता।
गुनाह क्या था? बस इतना ही —
गलत जगह पे पैदा हुआ।
दाढ़ी देख के ठप्पा लगा,
सबने कहा "ये तो वहीं होगा"।
ना आँखें पढ़ीं, ना सुना किसी ने,
शक के साए में मौत लिख दी।
फिर से देखो, इंसान बनकर,
नफ़रत नहीं, मोहब्बत चुनकर।।
सुकून वहीं से जन्म लेता है,
जहाँ नज़रें दुश्मन नहीं, इंसान देखती हैं।
वो आँकड़े बताते हैं — ये सिर्फ़ सुम्मार नहीं थे,
वो सपने थे, हँसी थीं, मासूमियाँ थीं।
ये लफ़्ज़ उन फ़लस्तीनी मासूमों के नाम हैं, जो अब भी ख़्वाबों में ज़िंदा हैं।
By Sonu Khan

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