खुदी की पिपास में
- Hashtag Kalakar
- Sep 17, 2025
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By Shobha Joshi
मनुष्यता की लीला रास में
ज़िंदगियाँ –
कभी मेरे पन की तलाश में
और कभी मेरे ही पन के अति विश्वास में
- चल रहीं हैं बस खुदी की पिपास में।
मंजिल की तयशुदा राह में
साथ मनचाहों का मिले न मिले
झंझावात विपरीत ही क्यूँ न चलें
छुटभइये भी आजमाइश कितने ही कर लें
और अड़चनों से भी जब निश्चय न हिले
तो हुलास तो होता ही होगा शायद
शांत होती खुदी की पिपास में।
पर जब चातुर्मास में शयन हो हृदेव का
और दीर्घ निंद्रा में हो जब पालनकर्ता सृष्टि का
नहीं होता खेवईया कोई संसार की कश्ती का
तब भी उद्योग कोई थमता नहीं
कल्याणकारक हो या काल की कुदृष्टि का
धरेश का ही तो प्रबंध सब
करता वो ही, सब है अंश उसी की कृति का
तब तो वो नहीं रहता अलमस्त खुदी की पिपास में।
तो हृदेव की सृष्टि का अंश मात्र एक
मानव क्यूँ रहता अधीर यूँ अंधविश्वास में
कि वो ही करण कारक है जीवन के हर विकास में
और कोसता निज परिवेश को किसी भी ह्रास में
नहीं समझता घटते जीवन की महत्ता को
आती जाती हर श्वांस में
तल्लीन है बस खुदी की पिपास –
और उसे शांत करने की कयास में।
By Shobha Joshi

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