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कौन हूँ मै


हाँ सच मे कौन हू मै


जन्मा तो मनुष्य हूँ मै

पर जब ऐसे ही जी रहा तो कौन हूँ मै

हाँ सच में कौन हूँ मै।


पाठशाला कॉलेजो मे सिखा तो बहोत हूँ मे

फिर भी जात-पात का शिकार बनके

घर मे रोता बैठा शोण हूँ मै

हाँ सच मे कौन हू मै।


ध्यास हे मुझे ज्ञान का, इसी ज्ञान का पुजारी हूँ

ना अभिमान किसी शौर्य का मांगे तो जान दूँ

ऐसा मे बलिदानी हूँ

फिर भी दुश्मन कहलाऊ ऐसा मे कर्ण हूँ

हाँ सच मे कौन हूँ मै।


परस्त्री को मार सकूँ परस्त्री को पकड सकूँ

फिर भी हँसता घूमूँ ऐसा मे दुःशासन हूँ

या फिर करने को अपराध ये कह सकूँ ऐसा मे दुर्योधन हूँ,

या फिर तोड सारे नियमोंको तोड सारे बंधनोंको

बस परस्त्री का सन्मान करता भाई इनकाही विकर्ण हूँ मै

हाँ सच मे कौन हू मै।




गुरु जिसका अहंकारी हो

छल कपट जिस के बाप का धर्म हो

लेकिन फिर भी भगवान श्रीकृष्ण जिसका सारथी हो

प्रयास जिसका सिर्फ सत्य की जय हो

हनुमान सा बलशाली जिसका मुकुट हो

सार्थ उसकाअभिमान हो

नाम जिसका पार्थ हो

तो कौन हूँ मे

हाँ सच मे कौन हूँ मे।



By Suraj Babasaheb Amale








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