कुदरत
- Hashtag Kalakar
- Dec 1
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By Dr. Seema Varma
नाच नचावे ऊपर वाला
पुतले बनकर नाचे हम
सोच रहे हैं खुद को काबिल
मार रहा है यही तो भ्रम।
कई घोंसले तोड़कर हमने
आशियाना अपना बना लिया
समझ महल है सपन का मेरे
महल को सुंदर सजा लिया।
लौट कर आया सांझ को पंछी
खोज रहा है अपना घर
जाल कील से बचा रहे हम
घायल करके उनके पर।
बहुत तरक्की कर ली हमने
विकास हुआ है बूढ़ा अब
जीर्ण-शीर्ण है काया जिसकी
संभालेगा कुदरत को कब?
सब्र किया कुदरत ने भी
दिए थे मौके हमको भी
सुधर जो जाते समय से हम सब
बदला न लेती कुदरत भी।
क्षीण हुई है मानव बुद्धि,
कुदरत के सैनिक उतरे हैं
पर्वत गिरिवर के रौद्र रूप संग
सागर नदिया भी बिफरे हैं।
संभल भी जाओ मानव अब तुम
प्रलय भयंकर आई है
सृष्टि पर एक सा हक है सबका
कैसे यह बात भुलाई है!
बादल बिजली है शस्त्र आकाश के,
वार से गांव बहा दिये,
आगे न बढ़ना मानव अब तुम
पर्वत ने पत्थर बिछा दिए।
पृथ्वी भी हाहाकार कर रही
क्रोधित समुद्र उफनाया है
छलकी आँखों संग बुद्धि ने
अब अपना शीश झुकाया है।
अब अपना शीश झुकाया है,
अब अपना शीश झुकाया है।
By Dr. Seema Varma

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