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एक दिन बिना सोचे

By Swati Kumari


अरे यार, कितना सोचते हो तुम!

एक दिन ज़िन्दगी को बिना सोचे जीकर देखो, देखो कैसा लगता है?

कैसा लगता है जब छोटी-सी गलती पर बिना सोचे मुस्कुराकर उसे नजरअंदाज किया जाए,

कैसा लगता है जब बिनमतलब के तानों को दिल पर लिए बग़ैर अनसुना किया जाए,

कैसा लगता है जब खुद में खुद को जिया जाए,

बिना ज़्यादा सोचे-समझे,बस अपने मन के हिसाब से।

एक दिन जीवन को जियो,कुछ अपने रबाब से।


जब जीकर देखा,तो सब कुछ अपना सा लगा,

कुछ ऐसा लगा जैसे चाँद ख़ूबसूरत लगता है अपने दाग़ के साथ,

जैसे समंदर की चुप्पी टूटी हो किसी मोड़ के पास,

जैसे मैं ख़ुद से मिली बड़े अरसे के बाद।


जीकर देखा तो महसूस किया —

बड़ा अच्छा लगता है।

बड़ा अच्छा लगता है,

बिना सोचे एक दिन जी लेना,

अपने भावनाओं की डोर अपने हाथों में ले लेना,

दिन के कुछ पल अपने लिए जी लेना,

मानो जैसे जीवन के अमृत रस को पी लेना।


जब अच्छा लगा तो सोचा —

एक दिन ही क्यों, हर रोज़ क्यों न जिया जाए,

जीवन के हर रस को हर्ष में तब्दील कर दिया जाए,

जैसे कलम से लिपटी स्याही हो,

जैसे खुशियों की बारात आई हो,

मानो जैसे हर दिन हीं दिवाली छाई हो।


वो कहते हैं न — “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।”

तो लोगों की परवाह छोड़ो,

जियो थोड़ा खुल के अपने हिसाब से।

अब एक दिन नहीं,

हर दिन जियो अपना जीवन—

बिना सोचे, बिना लोगों की परवाह के।


By Swati Kumari

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