Nov 131 min readइस भरी दुनिया में मैं खुद को Rated 0 out of 5 stars.No ratings yetBy Shriram Bhartiइस भरी दुनिया में मैं खुद को खुदी से अज्ञात करता हूँबंद कमरे में नक़ाब उतार करअपने आप से दो बात करता हूँमुसाफ़िर बनने आया हूँ मगर मंज़िल का मुझे पता नहीं हैमैं इसी तरह आसमान में आँखे गड़ाए दिन को रात करता हूँ!By Shriram Bharti
By Shriram Bhartiइस भरी दुनिया में मैं खुद को खुदी से अज्ञात करता हूँबंद कमरे में नक़ाब उतार करअपने आप से दो बात करता हूँमुसाफ़िर बनने आया हूँ मगर मंज़िल का मुझे पता नहीं हैमैं इसी तरह आसमान में आँखे गड़ाए दिन को रात करता हूँ!By Shriram Bharti
The BattlefieldBy Adil Raziq Wakil Forward. I must keep moving forward. Can’t look back. Can’t change lanes. Forward. I see the end. If only I could...
The Clothes They Left BehindBy Akanksha Patil The Sweater I keep his sweater, frayed and old, A warm embrace on nights so cold. He held me close, I held him tight,...
The Omnipotence and Reverberation of Elliptical RhetoricsBy Laiba Riaz Pertaining to the rhetorics, Elliptical, yet so omnipotent and reverberated, yonder once flourish in the realm of blinded...
Comentários