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इंसान ही हैं इंसानियत का शैतान

By Aditya Nandkumar Garde


धरती ने दिया था आंचल हरा, नदियों ने गाया था मधुर तराना,

आसमान में फेले थे तारे, हवा में भी बसी थी जीवन की वाणी पुरानी। 


पर इंसान आया लालच के साथ, अपने मन का ही गुलाम बनकर,

उसने मापा पर प्राकृतिक चीज़ को सोने से, 

और बेच डाली संवेदनाएं, मन के कोने से। 


 जहाँ प्रेम था, वहाँ द्वेष बोया, जहाँ शांति थी, वहाँ शोर संजोया,

 धरती की छाती काँप दी उसने, प्यास बुझाने वाले को भी जहर पिलाया उसने। 


 मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा, सभी में उसने दीवारें उतारी,

 ईश्वर को बांटा अपने अपने नामों में, 

मार डाला इंसानियत को, धर्मों के संग्रामों में। 


ज्ञान की रौशनी को बेचा, पुस्तकों का भी व्यापार कर डाला,

विज्ञान को शांति का सेतु न माना, बल्कि युद्ध का औजार बना डाला। 


आकाश की कोख में धुआं भर गया, धरती का दूध काला हो गया,

नदी की धारा खून से रंग गयी, जंगल का गीत राख में बदल गया। 


भाई को भाई से दूर कराया, दोस्त को भी दुश्मन बनाया,

हृदय में जो था करुणा का घर, वहाँ अब केवल शोर का ठहर। 


समय भी देख रहा मौन खड़ा, धरती का घाव अब बोल पड़ा,

आसमान की आंखें नम हुई, नदियों ने रो-रो कर कहा। 


“कब तक तू हमें जलाएगा? कब तक अपना घर बनाएगा?

क्या इंसान में कोई इंसान बचा है? या केवल शैतान ही जिंदा है?”


आज इंसान खुद ही शिकारी है, और शिकार भी भविष्य का,

अपने ही बनाए खेलों का कैदी, अपने ही बनाए पिंजरे में अटका पड़ा है। 


इंसान रोज़ आईने में तो देख लेता है, 

इंसान तब बदल जायेगा, जब आईना उसे देखेगा। 


इंसानियत का वृक्ष फिर से उग सकता है, प्रेम का फूल फिर से खिल सकता है,

क्या इंसान अपने भीतर के, शैतान को हरा सकता है?


तब इतिहास भी गवाही देगा, इंसान कभी शैतान बना था, 

पर उसने खुद को हराकर, इंसानियत को अमर कर दिया,

इंसान फिर से बहुत देर के बाद, इंसान बन गया। 


By Aditya Nandkumar Garde


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