अमावस की रात
- Hashtag Kalakar
- Nov 29
- 1 min read
By Anup Kumar Jaiswal
अर्ज किया है कि…
रात आज थोड़ी थोड़ी अजनबी क्यों लग रही, थोड़ी बेख़ौफ़ और ख़ौफ़ सी क्यों लग रही।
चाँद भी डरा - डरा सितारे भी हैं गूम, कि नज़र कोई बुरी मुझपर तो है न पड़ रही।
माना कि यार थोड़ा मैं आवारा सा हूँ, मगर हूँ बेचारा मैं तन्हाई का शिकार हूँ।
मिले कोई जो हमसफ़र बदल मैं जाऊँगा, चाहे रात हो अमावश मैं लौट आऊँगा।
जरा गौर फरमाइएगा.…
कि रात वो अमावश ही थी और बादल भी थे घिरे, मैंने सोचा ढूँढ लूँ क्यूँ यार चाँद हैं छिपे।
पूछा मैंने तारों से जो वो भी थे छुप रहे, बात क्या है कोई भी न आज कह रहे।
तभी गरज जोरों से बादलों ने था डरा दिया, और रात अँधेरी कुछ भी न था दिख रहा।
मैं लौटने को ही अब सोंच था रहा, कि तभी बिजलियों ने फिर रौशनी था बिखेरा।
वो बिजलियों की रौशनी और कोई था दिखा, कि झट से मैं भी उसी ओर था बढ़ा।
सिसक रही थी वो मगर बुर्के में थी खड़ी, पूछा तो उसने कुछ भी था न कहा।
मैने कहा अकेला हूँ चाहो तो साथ चल लो, रात है घनी बहुत बुर्का तो अब उठा लो।
आहिस्ता ही से सही उसने हाथ तो बढ़ाया, कि भींगी भींगी रात मैं उसको घर ले के आया।
टॉवल दी मैंने मेरी कहा तुम कपडे बदल लो, भींगी हो बहुत थोड़ी आग सेंक तो लो।
मैं कॉफी को मेरे किचन में गया था, लौट कर जो देखा यार चाँद ही खड़ा था।
बुर्के उतार कर वो इस क़दर चमक रही थी, रात अमावस की और बिजलियाँ जली थी।
कॉफी उसको दी और कुछ भी न मैं कहा था, मगर कि अगले पल उसने सोर्री कहा था।
दरअसल वो अपने घर से भाग आ गयी थी, रात अमावस की और रास्ता भटक गयी थी।
मैंने पूछा खाओगे क्या उसने कहा था सर तेरा,
मैंने पूछा पिओगे क्या उसने कहा मोहब्बत तेरी,
बातों पर उसके मुझे हँसी आ गयी थी मगर कि एक पल को मैं सोच में भी पड़ गया था।
तभी नज़र मेरी उसके पांवों पर गए थे, जो एक दूसरे से बखूबी यार उलटे थे।
अभी तलक थी ठंढ कि अब पसीने आ गए थे, डर से मुख से मेरे कुछ भी न निकल रहे थे।
समझ गयी थी वो कि मैं जान गया हूँ उसको, चुड़ैल है कोई मैं तो भांप गया हूँ उसको।
वो मुस्कुराती रही, मेरी रंगत थी उड़ गयी, उसने कहा घर जाना है चलो छोड़ दो मुझको।
चलते चलते अर्ज है……
जरुरी नहीं कि बिरादरी हो बुरी तो आनेवाला नस्ल भी पैदा बुरा ही होते हैं।
कभी कभी तो यार भगवान् भी सिखाने इंसानों को मृत्यलोक में जन्म लिया करते हैं।
ये बात और है कि बड़ी साजो सम्मान से हम रावण दहन किया करते हैं।
मगर कि ऐ दहन करने वालों क्या कभी अपनी भी गिरेबान में झाँका करते हैं।
By Anup Kumar Jaiswal

Comments