अपूर्णित
- Hashtag Kalakar
- Sep 17, 2025
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By Shobha Joshi
भटकते झुंड में गली गली
हाथ में लिए मजीरा, खड़ताल, ढोलकी
भजनों का भंडार होती गीतों की पोटली।
हैं तो हम जैसे ही प्रभु की ही संतति
पर मुख्यधारा के ठेकेदार नहीं
अपितु मुख्यधारा से बहिष्कृत कभी
अपनी अलग दुनिया उनकी
जहां मिलकर रहते सभी।
पिता नहीं भाई-बंधु नहीं और
माँ के स्नेह से भी वंचित
कदाचित याद तो आती ही होगी
भाव भी होते होंगे उद्वेलित।
शायद हरि भजन से ही मन को करते होंगे व्यवस्थित
अवश्य ही यह विषय नहीं कोई चर्चित।
पर सोचती हूँ कि
कैसे प्रभु की रचना हुई ऐसे वर्गीकृत
जहाँ अपनों से अलग कैसे रह पाते होंगे तृप्तित
और अपने भी कैसे कर पाते होंगे उनको जैसे निर्वासित।
फिर भी जीवन को निज जनों के कदाचित
इनकी मौजूदगी करती तो है प्रभावित
क्योंकि शुभ कार्य कोई भी हो आकांक्षित
इनके ढोलक की थाप और
आशीष गीतों के बिना
अधूरे से लगते, लगते जैसे अपूर्णित।
By Shobha Joshi

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